Study Habits for Kids: बच्चों में पढ़ाई की अच्छी आदत कैसे डालें – माता-पिता के लिए पूरी गाइड

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Study Habits for Kids: कई माता-पिता को लगता है कि बच्चे को बस स्कूल भेज देना और ट्यूशन लगवा देना काफ़ी है। पर पढ़ाई की आदत किताबों से नहीं, घर के रोज़ के माहौल से बनती है। कब बैठना है, कहाँ बैठना है, फ़ोन कहाँ रहेगा, गलती हो जाए तो घर में क्या होता है, इन्हीं छोटी बातों से बच्चा सीखता है कि पढ़ाई बोझ है या अपनी चीज़। इस लेख में हम समझेंगे कि बच्चे पढ़ाई से क्यों भागते हैं, आदत बनने में कितना समय लगता है, समय और जगह कैसे तय करें, स्क्रीन और नींद का पढ़ाई से क्या रिश्ता है, तारीफ़ कैसे करें और अलग-अलग उम्र में क्या बदलना चाहिए।

बच्चा पढ़ाई से भागता क्यों है

सबसे पहले यह देखना ज़रूरी है कि दिक्कत कहाँ है। हर बच्चा आलस की वजह से पढ़ाई से नहीं बचता। कई बार उसे चीज़ें समझ ही नहीं आ रही होतीं और वह शर्मिंदगी से बचने के लिए टालता है। कभी वह थका होता है, कभी घर में शोर होता है, कभी फ़ोन या टीवी ज़्यादा दिलचस्प लगता है। कुछ बच्चे इसलिए भी बचते हैं कि पढ़ाई उनके लिए घर में डाँट और तुलना से जुड़ चुकी है।

ऐसे में “चलो, बैठो पढ़ने” को बार-बार दोहराने से कुछ नहीं बदलता। एक-दो दिन आराम से बच्चे से पूछिए कि कौन-सा विषय सबसे भारी लगता है और पढ़ते समय सबसे ज़्यादा क्या तंग करता है। जवाब अक्सर वही चीज़ बता देता है जिसे ठीक करने की ज़रूरत है।

आदत बनने में कितना समय लगता है

बहुत लोग मानते हैं कि 21 दिन में कोई भी आदत बन जाती है। इसका वैज्ञानिक आधार कमज़ोर है। लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज में फ़िलिप्पा लैली और उनके साथियों ने 2009 में 96 लोगों पर एक अध्ययन किया, जिसमें हर किसी को रोज़ कोई एक नया काम करना था, जैसे दोपहर के खाने के साथ फल खाना या रोज़ थोड़ी देर टहलना। औसतन किसी काम को बिना सोचे करने की स्थिति तक पहुँचने में 66 दिन लगे। पर यह अवधि हर व्यक्ति के लिए अलग थी, किसी के लिए 18 दिन और किसी के लिए 254 दिन तक।

यह अध्ययन बड़ों पर हुआ था और सीधे पढ़ाई पर नहीं, इसलिए इसे पक्की गिनती नहीं, मोटा अंदाज़ा समझिए। इससे दो काम की बातें निकलती हैं। एक, आदत बनने में हफ़्ते नहीं, महीने लग सकते हैं, तो पहले महीने में नतीजा न दिखे तो हार न मानें। दो, लैली के मुताबिक किसी एक दिन का छूट जाना आदत को ख़ास नुकसान नहीं पहुँचाता, असली चीज़ दोहराव है और यह कि काम किसी तय स्थिति या समय से जुड़ा हो।

तय समय और तय जगह

आदत उसी में पड़ती है जो रोज़ एक ही मौके पर होता है। इसलिए पढ़ाई का एक तय समय रखिए, जैसे स्कूल से लौटकर खाना खाने और थोड़ा खेलने के बाद। समय चुनते हुए बच्चे की राय लीजिए। जो समय उसने ख़ुद चुना हो, उसे निभाना उसके लिए आसान होता है। थकान से भरी शाम या सोने से ठीक पहले का समय पढ़ाई के लिए आमतौर पर ठीक नहीं रहता।

जगह भी उतनी ही मायने रखती है। बिस्तर या सोफ़े पर पढ़ने से शरीर आराम की ओर जाता है। एक मेज़ और कुर्सी, अच्छी रोशनी और कम शोर वाला कोना काफ़ी है। अलग कमरा ज़रूरी नहीं। पढ़ाई शुरू करने से पहले कॉपी, किताब, पेन और पानी वहीं रख लें, ताकि बीच में उठकर ढूँढने का बहाना न मिले। उस वक़्त घर में टीवी की आवाज़ बंद रखना भी मदद करता है, वरना बच्चा मेज़ पर तो बैठेगा पर उसका मन कहीं और रहेगा।

छोटे सत्र से शुरुआत करें

जिस बच्चे को पढ़ने की आदत नहीं है, उसे पहले ही दिन दो घंटे बिठाना उलटा असर करता है। शुरुआत 15 से 20 मिनट से कीजिए और जब यह आसान लगने लगे, तब धीरे-धीरे समय बढ़ाइए। बड़े बच्चों के लिए 25 मिनट पढ़ाई और 5 मिनट आराम वाली पोमोडोरो तकनीक आज़माई जा सकती है। बीच के आराम में पानी पीना, खिड़की के पास खड़े होना या थोड़ा चलना ठीक है। फ़ोन उठाना नहीं, क्योंकि वहाँ से लौटना मुश्किल होता है।

लक्ष्य भी छोटा और साफ़ रखिए। “आज गणित पढ़ना है” की जगह “आज गणित के पाँच सवाल करने हैं” बच्चे को पता देता है कि काम कब पूरा हुआ। उसे पूरा करने का एहसास अगले दिन बैठने की इच्छा बढ़ाता है।

फ़ोन, टीवी और स्क्रीन

पढ़ाई की आदत के रास्ते में आज सबसे बड़ी रुकावट अक्सर स्क्रीन होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 2019 में पाँच साल से छोटे बच्चों के लिए दिशानिर्देश जारी किए। इनमें एक साल से छोटे बच्चों के लिए स्क्रीन का समय बिल्कुल नहीं, और दो से चार साल के बच्चों के लिए बैठे-बैठे स्क्रीन देखने का समय रोज़ एक घंटे से ज़्यादा नहीं रखने की सलाह है, यानी जितना कम हो उतना अच्छा। साथ ही बैठने के समय में कहानी सुनाना, गाना और पहेलियाँ जैसी चीज़ें करने को कहा गया है। बड़े बच्चों के लिए ऐसी कोई एक संख्या सब पर लागू नहीं होती, इसलिए घर का अपना नियम तय करना होगा।

नियम सब पर बराबर लागू हो तो टिकता है। पढ़ाई के समय फ़ोन दूसरे कमरे में रखें, और यह नियम माता-पिता पर भी लागू रखें। जो बच्चा देखता है कि पढ़ाई के समय माँ या पिता ख़ुद फ़ोन में लगे हैं, वह नियम को गंभीरता से नहीं लेता। अगर पढ़ाई के लिए ही ऑनलाइन सामग्री चाहिए, तो वही काम पहले निपटाकर बाकी स्क्रीन बंद कर दें। सोने से पहले का समय स्क्रीन से मुक्त रखें, क्योंकि उसका सीधा असर नींद पर पड़ता है।

नींद और खेलकूद को पढ़ाई से मत काटिए

परीक्षा के दिनों में सबसे पहले बच्चे की नींद और खेल पर कैंची चलती है। यह उलटा पड़ सकता है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ़ स्लीप मेडिसिन की सहमति से बनी सिफ़ारिश के अनुसार 6 से 12 साल के बच्चों को 24 घंटे में 9 से 12 घंटे और 13 से 18 साल के किशोरों को 8 से 10 घंटे की नींद चाहिए। इस सिफ़ारिश के मुताबिक पर्याप्त नींद का संबंध बेहतर ध्यान, याददाश्त, सीखने और व्यवहार से है।

इसलिए पढ़ाई का समय तय करते हुए पहले सोने और उठने का समय तय कीजिए और बाकी चीज़ें उसके हिसाब से बिठाइए। रोज़ कुछ देर खुले में खेलने का समय भी पढ़ाई जितना ही पक्का रखें। खेल के बाद बच्चा अक्सर ज़्यादा तरोताज़ा होकर बैठता है।

तारीफ़ ऐसे करें कि मेहनत बढ़े

कोलंबिया यूनिवर्सिटी की क्लॉडिया म्यूलर और कैरल ड्वेक ने 1998 में पाँचवीं कक्षा के बच्चों पर एक अध्ययन किया। बच्चों को सवाल हल करवाए गए और बाद में कुछ को “तुम बहुत समझदार हो” कहा गया, जबकि कुछ को उनकी मेहनत के लिए सराहा गया। नतीजे में मेहनत की तारीफ़ पाने वाले बच्चे मुश्किल कामों से कम घबराए, असफलता के बाद भी लगे रहे और कठिन सवाल चुनने को तैयार थे। “समझदार” कहे गए बच्चे आसान काम चुनने लगे, क्योंकि उन्हें अपनी छवि खोने का डर था। यह एक शोध-समूह के नतीजे हैं और हर बच्चे पर एक जैसा असर ज़रूरी नहीं, पर इसका व्यावहारिक सबक सीधा है।

“तुम तो पढ़ाई में तेज़ हो” की जगह कहिए, “आज तुमने यह मुश्किल सवाल छोड़ा नहीं, बैठकर हल किया।” तारीफ़ तब काम करती है जब वह ठीक उस चीज़ की हो जो बच्चे ने की है, चाहे वह टिके रहना हो, नया तरीका आज़माना हो या पिछली गलती सुधारना। नंबर आने पर ही नहीं, कोशिश के दिन भी बच्चे को यह सुनने की ज़रूरत होती है।

होमवर्क में कितनी मदद करें

मदद का मतलब होमवर्क करवा देना नहीं है। बच्चे के पास बैठिए, सवाल पढ़वाइए और पूछिए कि वह क्या सोच रहा है। अटक जाए तो जवाब बताने की जगह एक संकेत दीजिए। गलत जवाब पर तुरंत काटने के बजाय पूछिए, “यहाँ तक कैसे पहुँचे?” ऐसे सवाल बच्चे को अपनी सोच परखना सिखाते हैं।

यह भी देखिए कि स्कूल कितना होमवर्क दे रहा है। शिक्षा मंत्रालय की स्कूल बैग नीति 2020 में सुझाया गया है कि कक्षा 2 तक किसी को होमवर्क न मिले, कक्षा 3 से 5 तक हफ़्ते में ज़्यादा से ज़्यादा दो घंटे, कक्षा 6 से 8 तक रोज़ करीब एक घंटा और कक्षा 9 से 12 तक रोज़ अधिकतम दो घंटे। यह दिशानिर्देश स्कूलों के लिए है और अलग-अलग राज्यों और बोर्ड में इसका पालन अलग हो सकता है। अगर आपके बच्चे का बोझ इससे बहुत ज़्यादा है, तो पहले कक्षा-अध्यापक से बात कीजिए।

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उम्र के हिसाब से क्या बदलें

तीन से छह साल। इस उम्र में बैठाकर पढ़ाने पर ज़ोर मत दीजिए। कहानियाँ सुनाइए, पहेलियाँ पूछिए, गिनती और रंगों के खेल खेलिए, और किताब को घर की आम चीज़ बनाइए। आदत की नींव यहीं पड़ती है।

सात से बारह साल। इस उम्र में रोज़ का तय समय और तय जगह सबसे ज़्यादा काम करते हैं। बच्चे को अपनी कॉपी-किताब ख़ुद लगाना, अगले दिन का बस्ता तैयार करना और छोटी योजना बनाना सिखाइए। अभी आप पास बैठ सकते हैं, पर धीरे-धीरे दूरी बढ़ाइए।

तेरह साल और उसके बाद। किशोर बच्चे को आदेश नहीं, भागीदारी चाहिए। समय-सारणी उसके साथ बैठकर बनवाइए और फ़ैसले का हिस्सा उसे दीजिए। इस उम्र में नींद और फ़ोन का नियंत्रण सबसे मुश्किल होता है, इसलिए घर के नियम सब पर समान रखिए और ज़रूरत पड़ने पर बातचीत से सुधारिए।

माता-पिता की आम गलतियाँ

सबसे आम गलती तुलना है। “शर्मा जी का बेटा” वाली बात बच्चे को प्रेरित नहीं करती, उसे शर्मिंदा करती है और पढ़ाई से दूर करती है। दूसरी गलती इनाम और सज़ा का सौदा है, जैसे “अच्छे नंबर लाओ तो फ़ोन मिलेगा।” इससे बच्चा पढ़ाई को ऐसी चीज़ मानने लगता है जो सिर्फ़ किसी चीज़ के बदले की जाती है। तीसरी गलती सिर्फ़ नंबरों पर बात करना है। जब घर में सिर्फ़ रिज़ल्ट पर चर्चा होती है, तो बच्चा सीखने पर नहीं, नंबर बचाने पर ध्यान देने लगता है। चौथी गलती है बहुत सारी कोचिंग और ट्यूशन, जिनसे बच्चे के पास अपने आप पढ़ने, खेलने और सोने का समय ही नहीं बचता।

इनके बजाय बच्चे के साथ रोज़ पाँच मिनट यह बात कीजिए कि आज स्कूल में क्या नया सीखा। यह छोटी-सी आदत पढ़ाई को घर की बातचीत का हिस्सा बना देती है।

कब विशेषज्ञ की मदद लें

अगर नियमित समय, कम स्क्रीन और अच्छी नींद के बाद भी बच्चा लगातार पढ़ने या लिखने में अटकता है, अक्षर उलटे-पुलटे पहचानता है, एक जगह ध्यान टिकाने में बहुत मुश्किल होती है, या पढ़ाई का नाम सुनकर रोने या बीमार पड़ने लगता है, तो इसे सिर्फ़ आलस मत समझिए। पहले स्कूल के शिक्षक से बात कीजिए, फिर बाल रोग विशेषज्ञ से नज़र और सुनने की जाँच करवाइए। ज़रूरत लगे तो बाल मनोवैज्ञानिक या स्कूल काउंसलर से सलाह लीजिए। कई सीखने से जुड़ी दिक्कतें समय पर पहचान लेने पर काफ़ी हद तक संभाली जा सकती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

बच्चे को रोज़ कितनी देर पढ़ना चाहिए?

इसकी कोई एक संख्या सब पर लागू नहीं होती। छोटे बच्चों के लिए 15 से 20 मिनट से शुरू करना ठीक है और धीरे-धीरे समय बढ़ाइए। स्कूल बैग नीति 2020 में कक्षा के अनुसार होमवर्क की अधिकतम सीमा सुझाई गई है, जिसे आप आधार बना सकते हैं।

क्या 21 दिन में पढ़ाई की आदत बन जाती है?

नहीं, यह एक प्रचलित भ्रम है। 2009 के यूसीएल अध्ययन में औसतन 66 दिन लगे, और अलग-अलग लोगों में यह 18 से 254 दिन तक रहा। इसलिए धैर्य रखिए।

बच्चा फ़ोन के बिना पढ़ने को तैयार नहीं होता, क्या करें?

एकदम से पाबंदी लगाने की जगह पढ़ाई के समय फ़ोन दूसरे कमरे में रखने का नियम बनाइए और उसे घर में सब पर लागू कीजिए। सोने से पहले का समय भी स्क्रीन से मुक्त रखिए।

पढ़ाई के लिए इनाम देना ठीक है?

कभी-कभार छोटा उत्सव ठीक है, पर हर काम के बदले इनाम का सौदा आदत बिगाड़ सकता है। मेहनत की तारीफ़ और साथ बिताया समय ज़्यादा टिकाऊ असर देते हैं।

कब समझें कि बच्चे को पेशेवर मदद चाहिए?

अगर कोशिशों के बाद भी बच्चा पढ़ने-लिखने में लगातार पिछड़ रहा है या पढ़ाई से जुड़ा डर और बेचैनी दिखा रहा है, तो स्कूल के शिक्षक और बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लीजिए।

Laxmi Nautiyal

लक्ष्मी नौटियाल पिछले 5 सालों से कंटेंट राइटर के तौर पर काम कर रही हैं। उन्हें न्यूज, राजनीति, शिक्षा, मनोरंजन, खेल, बिजनेस और लाइफस्टाइल जैसे विषयों पर लिखने का अच्छा अनुभव है। वह इससे पहले कई वेबसाइट्स के लिए काम कर चुकी हैं। उनका मुख्य उद्देश्य पाठकों तक सही, उपयोगी और आसान भाषा में जानकारी पहुंचाना है। वह हर विषय पर रिसर्च करके ऐसा कंटेंट लिखने की कोशिश करती हैं, जिसे पाठक आसानी से समझ सकें और जिससे उन्हें जरूरी जानकारी मिल सके।

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