Local Fairs of Jharkhand: झारखंड में मेला सिर्फ खरीदारी की जगह नहीं है। यहां कोई मेला फसल कटने की खुशी में लगता है, कोई देवता की यात्रा के साथ और कोई उस इतिहास की याद में, जिसे गांव की पीढ़ियां अपने साथ ढोती आई हैं। दुमका का हिजला मेला, रांची का जगन्नाथपुर रथ मेला, मकर संक्रांति के आसपास लगने वाला टुसू मेला और देवघर का श्रावणी मेला इसके अच्छे उदाहरण हैं। इस लेख में हम झारखंड के इन स्थानीय मेलों का इतिहास, उनके लगने का समय और उनकी खासियत समझेंगे, और यह भी देखेंगे कि ये मेले आज भी लोगों को क्यों जोड़ते हैं।
झारखंड में मेले की जगह
झारखंड का बड़ा हिस्सा जंगल, पहाड़ और नदियों से घिरा है। यहां संथाल, मुंडा, उरांव और हो जैसी जनजातियां रहती हैं, और कुरमी जैसे कई दूसरे समुदाय भी। गांव दूर-दूर बसे होते हैं, इसलिए मेला वह मौका बनता रहा है, जब लोग एक जगह जुटते हैं, सामान की खरीद-बिक्री करते हैं और अपने गीत-नाच एक-दूसरे को दिखाते हैं।
मोटे तौर पर यहां के मेले तीन तरह के दिखते हैं। कुछ जनजातीय संस्कृति और इतिहास से जुड़े हैं, कुछ फसल और मौसम से, और कुछ धार्मिक यात्राओं से। कई मेलों में इनमें से एक से ज्यादा रंग मिल जाते हैं। इस लेख में हम पांच ऐसे मेलों की बात करेंगे, जिनके बारे में सरकारी पोर्टलों और भरोसेमंद रिपोर्टों में जानकारी मिलती है। राज्य में इनके अलावा सैकड़ों छोटे मेले भी लगते हैं, जिनकी तारीखें और परंपराएं इलाके के हिसाब से बदल जाती हैं।
हिजला मेला, दुमका: 1890 से चल रहा जनजातीय मेला
दुमका शहर से करीब चार किलोमीटर दूर मयूराक्षी नदी के किनारे हिजला गांव है। यहां हर साल फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष में, यानी आमतौर पर फरवरी के अंत से मार्च के पहले पखवाड़े के बीच, हिजला मेला लगता है।
सरकारी पोर्टलों के मुताबिक इसकी शुरुआत 1890 में उस समय के अंग्रेज जिला अधिकारी के कार्यकाल में हुई। मकसद था स्थानीय लोगों की परंपराओं, रीति-रिवाजों और सामाजिक व्यवस्था को समझना। अधिकारी का नाम अलग-अलग स्रोतों में अलग लिखा मिलता है, इसलिए यहां नाम नहीं दिया जा रहा। नाम को लेकर भी दो मान्यताएं हैं। एक के अनुसार हिजला शब्द अंग्रेजी के ‘हिज लॉज’ से निकला है, जबकि दूसरी के अनुसार मेले का नाम गांव हिजला पर पड़ा।
शुरुआत भले अंग्रेजी शासन में हुई हो, पर आज यह संथाल समाज और आसपास के गैर-आदिवासी समुदायों का साझा मेला है। झारखंड सरकार ने 2008 में इसे महोत्सव घोषित किया और 2015 में इसे राजकीय मेले का दर्जा मिला।
मेले में आदिवासी नृत्य-संगीत की प्रस्तुतियां होती हैं, खेलकूद होते हैं, पशुओं की खरीद-बिक्री होती है, किताबों की दुकानें लगती हैं और आदिवासी व्यंजनों के स्टॉल सजते हैं। बहस, क्विज और व्याख्यान जैसे कार्यक्रम भी इसका हिस्सा रहे हैं। ग्रामीण भारत पर काम करने वाले पोर्टल पारी की एक रिपोर्ट के अनुसार, हिजला गांव में मरांग बुरु को समर्पित एक अलग मेला भी लगता है। कोविड के दो सालों को छोड़कर यह मेला हर साल आयोजित होता रहा है।
जगन्नाथपुर रथ मेला, रांची: 1691 की विरासत
रांची के धुर्वा इलाके की एक छोटी पहाड़ी पर जगन्नाथ मंदिर है, जिसे बड़कागढ़ के ठाकुर एनीनाथ शाहदेव ने 1691 में बनवाया था। झारखंड पर्यटन विभाग के अनुसार मंदिर की बनावट पुरी के जगन्नाथ मंदिर की याद दिलाती है।
यहां रथ यात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को निकलती है, जो आमतौर पर जून-जुलाई में पड़ती है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को रथ पर बैठाकर करीब पांच सौ मीटर दूर मौसीबाड़ी ले जाया जाता है। वहां वे नौ दिन रुकते हैं और फिर घुरती रथ यात्रा के साथ मुख्य मंदिर लौटते हैं। इन्हीं दिनों मंदिर परिसर के आसपास मेला लगता है, जो करीब एक सप्ताह चलता है।
इस मेले की खासियत यह है कि इसमें शहर के लोगों के साथ आसपास के गांवों से आदिवासी और गैर-आदिवासी श्रद्धालु बड़ी संख्या में आते हैं। जुलाई 2026 में निकली रथ यात्रा को 335वीं रथ यात्रा बताया गया, यानी परंपरा बिना बड़े टूटे तीन सदी से ज्यादा पुरानी है। बीच में कोविड के कारण दो साल रथ यात्रा नहीं निकल सकी थी।
टुसू मेला: पूस की विदाई और मकर संक्रांति
टुसू छोटानागपुर इलाके का फसल उत्सव है। यह पूस महीने भर चलता है और मकर संक्रांति के दिन खत्म होता है। झारखंड में इसका केंद्र बुंडू, तमाड़ और राइडीह के आसपास का इलाका माना जाता है। बंगाल के पुरुलिया और ओडिशा के कुछ हिस्सों में भी यह मनाया जाता है।
परंपरा के अनुसार अविवाहित लड़कियां टुसू की मूर्ति बनाती हैं और घर पर उसकी पूजा करती हैं। संक्रांति के दिन टुसू को सजे हुए ढांचे चौडल में रखकर गाते-बजाते नदी तक ले जाया जाता है और विसर्जित किया जाता है। उसके बाद लोग नदी में स्नान करते हैं और सूर्य को अर्घ्य देते हैं। टुसू की कथा को लेकर अलग-अलग लोककथाएं सुनाई जाती हैं।
टुसू मेले का मौजूदा स्वरूप काफी हद तक आधुनिक है। कुरमाली भाषा परिषद के अध्यक्ष के हवाले से छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड बनने के बाद रांची के मोरहाबादी मैदान में टुसू मेला नियमित रूप से लगने लगा। जमशेदपुर के बिष्टुपुर के गोपाल मैदान में झारखंडवासी एकता मंच टुसू मेला कराता है, जिसकी शुरुआत 2006 में पूर्व सांसद सुनील महतो ने की थी। इन मेलों में टुसू, चौडल और बूढ़ी गाड़ी नृत्य की प्रतियोगिताएं होती हैं और विजेताओं को नकद इनाम मिलता है। महामारी के दौरान रांची का मेला दो साल बंद रहा था।
इसी रिपोर्ट के अनुसार यह समय ऐसा होता है, जब घर अनाज से भरे होते हैं और लोग नए कपड़े पहनते हैं। यानी मेले का रिश्ता सीधे खेत की कमाई से है।
रजरप्पा का मेला: दो नदियों के संगम पर
रामगढ़ जिले का रजरप्पा दामोदर और भैरवी (स्थानीय नाम भेड़ा) नदियों के संगम पर बसा है। यहां मां छिन्नमस्तिका का मंदिर है और पास में रजरप्पा जलप्रपात है। रामगढ़ से इसकी दूरी करीब 28 किलोमीटर बताई जाती है। मंदिर में झारखंड के साथ पश्चिम बंगाल और बिहार से भी श्रद्धालु आते हैं।
मकर संक्रांति पर यहां बड़ा मेला लगता है। दामोदर और भैरवी के संगम में स्नान करने के लिए लोग दूर-दूर से पहुंचते हैं, और उपलब्ध जानकारी के अनुसार भीड़ लाखों में पहुंचती है। इसके अलावा नवरात्र, महाशिवरात्रि और विजयादशमी पर भी यहां श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। इस मंदिर की कुछ परंपराएं, जैसे बलि की प्रथा, विवाद का विषय भी रही हैं, इसलिए जाने से पहले स्थानीय नियम और प्रशासन की सूचना देख लेना ठीक रहता है।
श्रावणी मेला, देवघर: महीने भर चलने वाली कांवड़ यात्रा
झारखंड के सबसे बड़े मेलों में देवघर का श्रावणी मेला आता है। यह श्रावण महीने में, यानी आमतौर पर जुलाई-अगस्त में, बाबा बैद्यनाथ धाम में लगता है, जो बारह ज्योतिर्लिंगों में गिना जाता है। जिला प्रशासन की वेबसाइट के अनुसार बैद्यनाथ धाम की शुरुआत प्राचीन काल में खो गई है, यानी इसका ठीक समय बताना संभव नहीं। लोककथा में कहा जाता है कि रावण शिवलिंग को लंका ले जा रहा था, लेकिन वह यहीं स्थापित हो गया।
इस मेले की पहचान कांवड़ यात्रा है। श्रद्धालु बिहार के सुल्तानगंज में उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरते हैं और करीब 100 से 110 किलोमीटर पैदल चलकर देवघर पहुंचते हैं। अलग-अलग स्रोत दूरी 103 से 111 किलोमीटर के बीच बताते हैं, क्योंकि रास्ते और गिनती के तरीके अलग हैं। कई लोग नंगे पांव चलते हैं और रास्ते भर बोल बम का जयकारा गूंजता है। मंदिर में शिवलिंग पर जल चढ़ाने के साथ यह यात्रा पूरी होती है।
हर साल प्रशासन लाखों श्रद्धालुओं के आने का अनुमान लगाता है। संख्या साल-दर-साल बदलती है, इसलिए कोई एक आंकड़ा पक्का नहीं माना जा सकता। यह मेला एक महीने तक चलता है और इस दौरान पूरा देवघर शहर सुल्तानगंज से देवघर तक के रास्ते जैसा ही व्यस्त हो जाता है।
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इन मेलों की खासियत क्या है
इन मेलों की सबसे पहली खासियत साझापन है। हिजला में आदिवासी और गैर-आदिवासी साथ आते हैं, रथ मेले में शहर और आसपास के गांवों के लोग, टुसू में अलग-अलग समुदाय और श्रावणी में कई राज्यों के श्रद्धालु।
दूसरी खासियत लोक कला है। टुसू मेलों में टुसू, चौडल और बूढ़ी गाड़ी नृत्य की प्रतियोगिताएं होती हैं और हिजला में आदिवासी नृत्य-संगीत की प्रस्तुतियां। ऐसे मंच कलाकारों को पहचान और इनाम दोनों देते हैं।
तीसरी बात मौसम और खेती से रिश्ता है। टुसू फसल के बाद आता है, हिजला फाल्गुन में और श्रावणी बरसात के महीने में। तारीखें ज्यादातर हिंदू पंचांग से तय होती हैं, इसलिए अंग्रेजी कैलेंडर में हर साल बदल जाती हैं।
चौथी बात छोटी अर्थव्यवस्था की है। पशुओं की बिक्री, किताबों की दुकानें, खान-पान के स्टॉल, कारीगरों का सामान और अस्थायी दुकानें, ये सब कई परिवारों की कमाई का हिस्सा बनते हैं।
मेले आज किन चुनौतियों से गुजर रहे हैं
इन मेलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती भीड़ और व्यवस्था की है। श्रावणी और रथ यात्रा जैसे आयोजनों में लाखों लोग जुटते हैं, इसलिए सड़क, पानी, सफाई और सुरक्षा का इंतजाम हर साल बड़ा सवाल रहता है। दूसरी चुनौती परंपरा और आधुनिक मंच के बीच संतुलन की है। हिजला जैसे मेले में मंच और प्रतियोगिताएं बढ़ने के साथ गांव की सहज परंपरा कहीं पीछे न छूट जाए, इस पर आयोजकों और स्थानीय समुदायों को ध्यान देना पड़ता है।
कोविड के दौर में कई मेले एक-दो साल रुक गए थे। इससे यह भी दिखा कि जब मेले नहीं लगते तो कलाकारों, छोटे दुकानदारों और कारीगरों की आमदनी पर सीधा असर पड़ता है।
मेले देखने जाना हो तो ये बातें याद रखें
ज्यादातर मेलों की तारीख हर साल बदलती है, इसलिए यात्रा तय करने से पहले जिला प्रशासन या झारखंड पर्यटन की वेबसाइट पर तारीख देख लें। मोटे तौर पर टुसू और रजरप्पा का मकर संक्रांति मेला जनवरी में, हिजला फरवरी-मार्च में, रथ मेला जून-जुलाई में और श्रावणी मेला जुलाई-अगस्त में पड़ता है। श्रावणी और रथ यात्रा जैसे बड़े आयोजनों में भीड़ और ट्रैफिक को देखते हुए ठहरने और आने-जाने का इंतजाम पहले कर लेना बेहतर रहता है। वहां मिलने वाले आदिवासी व्यंजन और हस्तशिल्प आजमाएं और कलाकारों के कार्यक्रम भी देखें।




















