छोटानागपुर पठार पर बसे झारखंड में नदियाँ पहाड़ों से उतरते हुए कई जगह अचानक सैकड़ों फ़ीट नीचे गिर पड़ती हैं। यही वजह है कि राँची को “झरनों का शहर” कहा जाता है। ज़्यादातर झरने राँची से एक दिन में आने-जाने की दूरी पर हैं, इसलिए वीकेंड ट्रिप के लिए भी ठीक बैठते हैं। पर एक दिक्कत है। बारिश में यही झरने पूरे उफान पर होते हैं और गर्मियों में कुछ तो लगभग सूख जाते हैं। गलत महीने में पहुँच गए तो पत्थरों के बीच पानी की पतली धार ही देखने को मिलेगी। इसलिए इस आर्टिकल में हर झरने की जानकारी के साथ यह भी बताया है कि वहाँ कब जाना ठीक रहता है और किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
झारखंड के झरनों की ऊँचाई एक नज़र में
| झरना | जिला | नदी | ऊँचाई (लगभग) |
|---|---|---|---|
| लोध फॉल्स | लातेहार | बूढ़ा नदी | 143 मीटर |
| हुंडरू फॉल्स | राँची | सुवर्णरेखा | 98 मीटर |
| लोअर घाघरी फॉल्स | लातेहार | नेतरहाट क्षेत्र | 98 मीटर |
| दशम फॉल्स | राँची | कांची | 44 मीटर |
| जोन्हा फॉल्स | राँची | राड़ू | 43 मीटर |
| हिरनी फॉल्स | पश्चिमी सिंहभूम | रामगढ़ा | 37 मीटर |
| उसरी फॉल्स | गिरिडीह | उसरी | 12 मीटर |
| सीता फॉल्स | रांची | राढू | 44 मीटर |
| राजरप्पा फॉल्स | रामगढ़ | भैरवी | 9 मीटर |
| पंचघाघ फॉल्स | खूँटी | बनई |
ऊँचाई के आँकड़े अलग-अलग स्रोतों में थोड़े अलग मिलते हैं, इसलिए इन्हें अंदाज़ा समझिए, सटीक माप नहीं।
लोध फॉल्स, लातेहार

झारखंड का सबसे ऊँचा झरना यही है। इसे बूढ़ा घाघ भी कहते हैं। बूढ़ा नदी यहाँ करीब 143 मीटर की ऊँचाई से कई चरणों में गिरती है। यह झरना पलामू टाइगर रिज़र्व के जंगल के बीच है, इसलिए रास्ता भी जंगल से होकर जाता है।
यह नेतरहाट से लगभग 61 किलोमीटर और लातेहार जिला मुख्यालय से करीब 142 किलोमीटर दूर है। दूरी ज़्यादा है, तो इसे आधे दिन की सैर न समझें। नेतरहाट में रुककर अगली सुबह जाना बेहतर रहता है।
लातेहार जिला प्रशासन की वेबसाइट के मुताबिक भारी बारिश के समय यहाँ जाने से बचना चाहिए, क्योंकि पत्थर फिसलन भरे होते हैं और बहाव तेज़ रहता है। झरने के नीचे का कुंड बहुत गहरा बताया जाता है, इसलिए उसमें उतरने की कोशिश न करें।
हुंडरू फॉल्स, राँची

सुवर्णरेखा नदी यहाँ करीब 98 मीटर की ऊँचाई से गिरती है, और राँची के आसपास यह सबसे ज़्यादा जाना जाने वाला झरना है। राँची से इसकी दूरी लगभग 45 किलोमीटर है।
यहाँ नीचे उतरने के लिए सीढ़ियाँ बनी हैं। नीचे पहुँचकर पानी की फुहार सीधे चेहरे पर आती है और आसपास बड़ी-बड़ी चट्टानें दिखती हैं, जिन पर बैठकर लोग घंटों बिताते हैं। यह बाकी झरनों के मुकाबले ज़्यादा भीड़ वाला भी है, ख़ासकर बारिश के मौसम और छुट्टियों में।
अगर शांति चाहिए तो हफ़्ते के किसी दिन सुबह जल्दी पहुँचिए। गर्मियों में यहाँ पानी बहुत कम हो जाता है, इसलिए अप्रैल-मई में जाना बेकार ही रहेगा।
दशम फॉल्स, राँची

कांची नदी यहाँ करीब 44 मीटर नीचे गिरती है। यह राँची-टाटा रोड पर ताइमारा गाँव के पास है और राँची से करीब 40 किलोमीटर दूर है। इसका स्थानीय नाम दशम घाघ है, जिसे मुंडारी भाषा का शब्द बताया जाता है।
झरने के चारों तरफ़ जंगल है और पानी चट्टानों की कई परतों पर उतरता है। फ़ोटो खींचने के लिए यह जगह अच्छी है।
लेकिन इसे लेकर एक सावधानी ज़रूर रखें। यहाँ पहले कई बार लोगों के डूबने के मामले सामने आ चुके हैं। पानी देखने में उथला लग सकता है, पर बहाव और नीचे की चट्टानें धोखा देती हैं। किनारे पर रहकर ही देखें।
जोन्हा फॉल्स, राँची

राड़ू नदी यहाँ करीब 43 मीटर की ऊँचाई से एक गहरी घाटी में गिरती है। इसे गौतम धारा भी कहते हैं, क्योंकि पास में भगवान बुद्ध का एक मंदिर बना है।
झरने तक पहुँचने के लिए करीब 700 सीढ़ियाँ उतरनी पड़ती हैं। उतरना आसान है, पर लौटते समय चढ़ाई थका देती है। अगर बुज़ुर्गों या छोटे बच्चों के साथ जा रहे हैं, तो यह बात पहले सोच लें। जोन्हा रिसॉर्ट की तरफ़ से बिना इतनी सीढ़ियाँ चढ़े झरने को देखने का रास्ता भी बताया जाता है।
जोन्हा स्टेशन झरने से मात्र 1.5 किलोमीटर दूर है। राँची से इसकी दूरी भी लगभग 40 किलोमीटर है, तो दशम और जोन्हा को एक ही दिन में जोड़ा जा सकता है।
हिरनी फॉल्स, पश्चिमी सिंहभूम

रामगढ़ा नदी बंदगाँव के पास करीब 37 मीटर नीचे गिरती है। झरना घने जंगल के बीच है, और चक्रधरपुर की तरफ़ से जाने पर आख़िर में हिरनी गाँव से करीब आधा किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है।
यह राँची के बाकी झरनों से अलग दिशा में है, इसलिए एक ही ट्रिप में सब नहीं निपटते। अगर आप सिंहभूम की तरफ़ जा रहे हों, तो इसे रास्ते में जोड़ लें। अलग से सिर्फ़ इसके लिए जाना हो, तो पूरा दिन रखें।
पंचघाघ फॉल्स, खूँटी

बनई नदी यहाँ पाँच धाराओं में बँटकर चट्टानों पर उतरती है, इसीलिए नाम पंचघाघ पड़ा। खूँटी शहर से यह करीब 8 किलोमीटर दूर है।
यह बाकी झरनों जितना ऊँचा नहीं है, और इसी वजह से इसे उन झरनों में गिना जाता है जहाँ लोग अपेक्षाकृत आसानी से पानी का मज़ा ले पाते हैं। परिवार के साथ पिकनिक के लिए यह अच्छा विकल्प है। फिर भी बारिश में बहाव अचानक बढ़ सकता है, तो पानी में उतरने से पहले स्थानीय लोगों से पूछ लें।
लोअर घाघरी फॉल्स, नेतरहाट

लातेहार ज़िले में नेतरहाट के पास लोअर घाघरी फॉल्स है, जिसकी ऊँचाई करीब 98 मीटर बताई जाती है। अगर आप नेतरहाट घूमने जा रहे हैं, तो इसे अपनी लिस्ट में रखिए। इसके पास अपर घाघरी फॉल्स भी है। यहाँ भी बारिश के बाद के महीने सबसे अच्छे रहते हैं, जब हरियाली और पानी दोनों भरपूर होते हैं।
उसरी फॉल्स, गिरिडीह

उसरी नदी तीन धाराओं में लगभग 12 मीटर नीचे गिरती है। ऊँचाई कम है, पर यह गिरिडीह शहर से करीब 13 किलोमीटर की दूरी पर है, इसलिए पिकनिक के लिए लोकप्रिय है। यह राँची वाली दिशा से बिल्कुल अलग, उत्तरी छोटानागपुर में पड़ता है।
सीता फॉल्स, राँची

राँची-पुरुलिया रोड (NH-32) पर राँची से करीब 40 किलोमीटर पूर्व में सीता फॉल्स है। इसकी ऊँचाई लगभग 44 मीटर बताई जाती है। यह घने जंगल के बीच चट्टानों की कतार पर उतरता है, इसलिए दशम और जोन्हा की तुलना में यहाँ शांति ज़्यादा मिलती है। नाम माता सीता से जुड़ा है, और स्थानीय मान्यता है कि वनवास के दौरान वे यहाँ आई थीं। जोन्हा और दशम के रास्ते में पड़ता है, इसलिए एक ही दिन में तीनों जोड़े जा सकते हैं। यह जलप्रपात राढु नदी पर स्थित है, जो सुबर्णरेखा नदी की एक उपनदी है।
राजरप्पा फॉल्स, रामगढ़

रामगढ़ ज़िले में भैरवी (स्थानीय नाम भेड़ा) नदी दामोदर नदी से मिलने से ठीक पहले करीब 9 मीटर की ऊँचाई से गिरती है। यही राजरप्पा फॉल्स है। इसकी ऊँचाई बाकी झरनों जितनी नहीं है, पर इसकी पहचान दूसरी वजह से है। यहीं दोनों नदियों के संगम पर प्रसिद्ध छिन्नमस्तिका मंदिर है, जिसे पूर्वी भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में गिना जाता है। इसलिए यह झरना और तीर्थ, दोनों के लिए जाना जाता है। यह राँची से करीब 70 किलोमीटर दूर है। यहाँ बोटिंग की सुविधा भी बताई जाती है।
झरनों पर जाने का सही समय
बात सीधी है। झरनों में पानी तभी भरपूर होता है, जब पहाड़ों से बहने वाली नदियाँ भरी हों, यानी मानसून के दौरान और उसके तुरंत बाद। इसी हिसाब से सोचिए:
जुलाई से सितंबर: पानी का बहाव सबसे ज़्यादा रहता है और झरने सबसे भव्य दिखते हैं। पर इसी समय फिसलन, तेज़ बहाव और अचानक पानी बढ़ने का ख़तरा भी सबसे ज़्यादा है। कई जगहों पर पहुँचने के रास्ते भी ख़राब हो जाते हैं।
अक्टूबर से फरवरी: ज़्यादातर लोगों के लिए यही सबसे ठीक समय है। बारिश के बाद नदियों में पानी बचा रहता है, मौसम सुहावना होता है और चलने-फिरने में दिक्कत नहीं होती। सितंबर के आख़िरी हफ़्तों से नवंबर तक का समय ख़ास तौर पर अच्छा रहता है, क्योंकि तब हरियाली भी बनी रहती है।
मार्च से जून: गर्मी में कई झरने बहुत कमज़ोर पड़ जाते हैं, और कुछ में तो नाम मात्र का पानी बचता है। इस समय जाने का कोई फ़ायदा नहीं।
अगर आपको सिर्फ़ एक सलाह चाहिए, तो वह यह है: अक्टूबर के आसपास निकलिए, और निकलने से पहले स्थानीय लोगों या ड्राइवर से झरने में पानी की ताज़ा हालत पूछ लीजिए। अलग-अलग साल में बारिश अलग होती है, इसलिए कैलेंडर के भरोसे मत रहिए।
जाने से पहले काम की बातें
- झरनों के पास पत्थर काई जमने से बहुत फिसलन भरे हो जाते हैं। चप्पल की जगह अच्छी ग्रिप वाले जूते पहनिए।
- गहरे कुंडों और बहते पानी में न उतरें, चाहे पानी कितना भी शांत दिखे।
- कई झरने जंगल या दूर-दराज़ इलाकों में हैं, जहाँ नेटवर्क कमज़ोर रहता है। पानी, कुछ खाने का सामान और ज़रूरी दवाएँ साथ रखिए।
- अंधेरा होने से पहले लौटने का हिसाब बनाइए, ख़ासकर लोध और हिरनी जैसी जगहों पर।
- कचरा वहीं मत छोड़िए। इन जगहों की सुंदरता तभी बचेगी, जब लोग इन्हें साफ़ रखेंगे।
- एंट्री फ़ीस, खुलने का समय और सड़क की हालत जाने से पहले एक बार ताज़ा देख लें, क्योंकि ये बदलते रहते हैं।
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