Bharat Ke Gaon Ki Anokhi Parampara: भारत के गांवों की अनोखी परंपराएं सिर्फ त्योहार या मेले नहीं हैं। इनमें जंगल बचाने के नियम हैं, झगड़े सुलझाने के तरीके हैं और मिल-जुलकर रहने की आदतें हैं।
नीचे राज्य और इलाके के हिसाब से ऐसी ही छोटी-छोटी, मगर दिलचस्प परंपराएं दी गई हैं जो आज भी निभाई जा रही हैं।
राजस्थान
ओरण: गांव के देवता के नाम पर छोड़ा गया पवित्र जंगल। यहां पेड़ काटना और शिकार करना मना है।
खेजड़ली और बिश्नोई समाज: 1730 में जोधपुर के खेजड़ली गांव में खेजड़ी के पेड़ बचाने के लिए लोगों ने जान दे दी थी। बिश्नोई आज भी पेड़ों और हिरणों को परिवार जैसा मानते हैं।
टांके और जोहड़: बारिश का पानी जमा करने के पुराने इंतज़ाम। रेगिस्तानी गांव सदियों इन्हीं के भरोसे चले।
गणगौर: होली के अगले दिन से महिलाएं मिट्टी की गौरी और ईसर की मूर्तियां बनाकर पूजती हैं और गीत गाती हैं।
कच्छी घोड़ी: शेखावाटी में शादी-ब्याह के मौके पर नर्तक बांस की बनी घोड़ी का ढांचा कमर से बांधकर तलवार के साथ नाचते हैं।
कालबेलिया नृत्य: सपेरा समुदाय की इस कला को यूनेस्को की सूची में जगह मिली है।
उत्तराखंड और हिमाचल
जागर: रात में ढोल-दमाऊ की थाप पर देवता की कथा गाई जाती है, और माना जाता है कि देवता किसी के शरीर में आकर परिवार की परेशानी सुनते हैं।
गोलू देवता: कुमाऊं में इन्हें न्याय का देवता कहा जाता है। अल्मोड़ा के पास चितई के मंदिर में लोग अपनी अर्जी कागज़ पर लिखकर टांग जाते हैं।
हरेला: सावन की शुरुआत पर मनाया जाने वाला हरियाली का पर्व। दस दिन पहले बोए गए अनाज के पौधे काटकर घर के बड़ों के सिर पर रखे जाते हैं।
नंदा देवी राजजात: करीब हर 12 साल में होने वाली पहाड़ी पैदल यात्रा, जो लगभग 280 किलोमीटर लंबी बताई जाती है। इसमें आगे-आगे चार सींग वाला मेढ़ा चलता है।
कुल्लू दशहरा: जब देश में दशहरा खत्म हो जाता है, तब यहां शुरू होता है। घाटी के सैकड़ों देवी-देवताओं की पालकियां भगवान रघुनाथ के दरबार में आती हैं।
फुलैच (किन्नौर): ऊंचे चरागाहों से फूल चुनकर लाए जाते हैं और देवता को चढ़ाए जाते हैं।
उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा
लठमार होली: बरसाना और नंदगांव में महिलाएं पुरुषों पर लाठियां बरसाती हैं और पुरुष ढाल से बचते हैं।
लोहड़ी: जनवरी में अलाव जलाकर नई फसल की खुशी मनाई जाती है। गांव के बच्चे घर-घर जाकर गीत गाते हैं।
बैसाखी: रबी की कटाई का उत्सव। पंजाब के गांवों में मेले लगते हैं और भांगड़ा होता है।
चौपाल: गांव के बड़े पेड़ या चबूतरे पर रोज़ बैठकर बात करने की जगह, जहां आज भी कई छोटे फैसले हो जाते हैं।
छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश
बस्तर दशहरा: करीब 75 दिन चलता है और इसमें रावण दहन नहीं होता। यह देवी दंतेश्वरी को समर्पित है, और लकड़ी का विशाल रथ आदिवासी खुद बनाते और खींचते हैं।
गोंचा पर्व (बस्तर): रथयात्रा के दौरान बांस की तुपकी से जंगली फल के दाने दागे जाते हैं। यह बंदूक का खिलौना जैसा है।
हरेली: सावन की अमावस्या पर किसान हल और औज़ारों की पूजा करते हैं। बच्चे बांस की ऊंची गेड़ी पर चलते हैं।
रामनामी समाज: इस समाज के लोग पूरे शरीर पर राम नाम गुदवाते हैं और मोरपंख का मुकुट पहनते हैं।
पंडवानी: महाभारत की कथा तंबूरा बजाते हुए गाकर सुनाने की लोक कला। इसे तीजन बाई ने दुनिया भर में पहचान दिलाई।
भगोरिया (झाबुआ, अलीराजपुर): होली से पहले लगने वाले आदिवासी हाट-मेले। इन्हें लेकर बाहर कई गलत धारणाएं भी हैं, इसलिए स्थानीय लोगों से बात करके ही लिखना ठीक रहता है।
पूर्वोत्तर भारत
खासी समाज (मेघालय): यहां संपत्ति मां से सबसे छोटी बेटी को मिलती है और बच्चे मां का उपनाम लेते हैं। इस व्यवस्था पर वहां आज भी बहस चलती है।
जीवित जड़ों के पुल (मेघालय): खासी और जयंतिया गांवों में रबर के पेड़ों की जड़ों को सालों तक मोड़कर नदी पर पुल बनाए जाते हैं। ये पुल पीढ़ियों तक चलते हैं।
मावफलांग का पवित्र जंगल: शिलांग के पास इस जंगल से लोग न पत्ता तोड़ते हैं, न लकड़ी ले जाते हैं।
अपातानी खेती (अरुणाचल): ज़ीरो घाटी में एक ही खेत में धान और मछली पाली जाती है।
हॉर्नबिल उत्सव (नागालैंड): अलग-अलग नागा जनजातियां अपने पहनावे, गीत और खेल दिखाती हैं। दिसंबर में यह कोहिमा के पास होता है।
बिहू (असम): बोहाग बिहू नए साल और बुवाई की खुशी का पर्व है। गांव की लड़कियां और लड़के ढोल-पेपा की धुन पर नाचते हैं।
पूर्वी भारत
रज पर्व (ओडिशा): तीन दिन धरती को आराम दिया जाता है। हल नहीं चलता, खुदाई बंद रहती है, लड़कियां झूले झूलती हैं और घर-घर पीठा बनता है।
सरहुल (झारखंड): आदिवासी साल के पेड़ की पूजा करके नए साल और नई फसल का स्वागत करते हैं।
सोहराय चित्रकला (झारखंड): फसल कटने के बाद महिलाएं घरों की दीवारों पर पशुओं और पेड़ों की आकृतियां बनाती हैं।
मधुबनी चित्र (बिहार): मिथिला की महिलाएं शादी और त्योहारों पर दीवारें रंगती थीं। आज यह कला दुनिया में पहचानी जाती है।
छठ पूजा: नदी या तालाब के किनारे डूबते और उगते सूरज को अर्घ्य दिया जाता है। इसमें पंडित की ज़रूरत नहीं पड़ती।
पटचित्र (बंगाल, ओडिशा): कलाकार कपड़े पर बनी लंबी चित्र-पट्टी खोलते जाते हैं और उसकी कथा गाकर सुनाते हैं।
बाउल गायन (बंगाल): घूमते-फिरते फकीर एकतारा बजाकर प्रेम और इंसानियत के गीत गाते हैं। इसे यूनेस्को ने भी सूची में रखा है।
दक्षिण भारत
तेय्यम (उत्तर केरल): कलाकार चेहरे पर गहरे रंग लगाकर और भारी मुकुट पहनकर देवता का रूप धरते हैं। अक्टूबर के आसपास से मई तक कावुओं यानी पूजा-स्थलों में यह चलता है।
अय्यनार (तमिलनाडु): गांव की सीमा पर रक्षक देवता के नाम पर मिट्टी के बड़े-बड़े घोड़े रखे जाते हैं।
पोंगल और मट्टू पोंगल: फसल के बाद सूरज का धन्यवाद किया जाता है, और अगले दिन बैलों को सजाकर उनकी पूजा होती है।
जल्लीकट्टू: पोंगल के आसपास होने वाला सांड काबू करने का खेल। इसके पक्ष और विरोध में अदालतों तक बहस हुई है।
कंबाला (तटीय कर्नाटक): पानी भरे धान के खेत में भैंसों की जोड़ी के साथ दौड़ लगाई जाती है।
यक्षगान (कर्नाटक): रात भर चलने वाला नृत्य-नाट्य, जिसमें पौराणिक कथाएं गाई और अभिनीत की जाती हैं।
बोनालु (तेलंगाना): आषाढ़ में महिलाएं सिर पर भोजन से भरे घड़े रखकर देवी को चढ़ाने जाती हैं।
बतुकम्मा (तेलंगाना): फूलों का ऊंचा ढेर सजाकर उसके चारों ओर महिलाएं गाती और नाचती हैं।
पश्चिम भारत
भूंगा (कच्छ, गुजरात): गोल मिट्टी के घर, जिनकी दीवारों पर रंगीन नक्काशी होती है। इन्हें भूकंप में टिके रहने के लिए जाना जाता है।
रबारी और अहीर कढ़ाई: कच्छ की महिलाएं हाथ से शीशे और धागे की बारीक कढ़ाई करती हैं।
पालखी वारी (महाराष्ट्र): आषाढ़ में लाखों वारकरी संतों की पालकी के साथ पैदल चलकर पंढरपुर पहुंचते हैं।
पोला (महाराष्ट्र): किसान अपने बैलों को नहलाकर, सजाकर उनकी पूजा करते हैं।
शनि शिंगणापुर (महाराष्ट्र): यहां के घरों में परंपरागत रूप से दरवाज़े नहीं लगते थे, हालांकि अब इसमें बदलाव आ रहे हैं।
इन सभी परंपराओं में एक बात साझा है। इन्हें बनाने वालों ने पेड़, पानी, न्याय और बराबरी जैसी बड़ी बातों को रोज़ की रीतियों में बदल दिया, ताकि वे आदत बन जाएं।
कुछ रीतियां वक्त के साथ बदल रही हैं और कुछ पर सवाल भी उठते हैं। फिर भी जो रीतियां जंगल, पानी और इंसानी रिश्ते बचाती हैं, उन्हें समझना और संभालना आज पहले से ज़्यादा ज़रूरी है।
अगली बार किसी गांव जाएं तो वहां के किसी बुज़ुर्ग से पूछिए कि यह रीति कब से चल रही है और क्यों। जवाब अक्सर किताब से ज़्यादा दिलचस्प निकलता है।
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