Durga Puja in Bengal: बंगाल में दुर्गा पूजा कैसे मनाई जाती है? जानिए 9 दिनों की रस्में, पंडाल की खासियत और दिलचश्प इतिहास

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Durga Puja in Bengal : अक्टूबर की शुरुआत होते ही बंगाल की हवा बदलने लगती है। सुबह-सुबह कांस के सफ़ेद फूल सड़क किनारे लहराते दिखते हैं, मौसम में हल्की सी ठंडक आ जाती है और कहीं दूर से ढाक की आवाज़ सुनाई देने लगती है। बस, समझ जाइए कि पूजो आ गई है। बंगाल के लिए Durga Puja सिर्फ़ एक त्योहार नहीं है, ये एक इमोशन है, एक पूरा सीज़न है, जिसका इंतज़ार लोग साल भर करते हैं।

अगर आपने कभी सोचा है कि बंगाल में दुर्गा पूजा कैसे मनाई जाती है और बाकी भारत की नवरात्रि से ये कितनी अलग है, तो इस आर्टिकल में हम इसे आराम से समझेंगे। इसका इतिहास क्या है, कौन-कौन सी रस्में निभाई जाती हैं, पंडाल इतने ख़ास क्यों होते हैं और खाने-पीने से लेकर सिंदूर खेला तक, सब कुछ यहाँ मिलेगा।

दुर्गा पूजा का इतिहास: शुरुआत कहाँ से हुई?

सबसे पहले बात इतिहास की, क्योंकि दुर्गा पूजा का इतिहास काफ़ी दिलचस्प है और इसके बारे में अलग-अलग कहानियाँ मिलती हैं।

पौराणिक कथा: महिषासुर और माँ दुर्गा

धार्मिक मान्यता के अनुसार महिषासुर नाम का एक शक्तिशाली असुर था, जिसे वरदान मिला था कि कोई पुरुष या देवता उसे हरा नहीं सकेगा। उसने स्वर्ग पर कब्ज़ा कर लिया तो सारे देवताओं ने मिलकर अपनी शक्तियों से एक देवी को प्रकट किया, जो थीं माँ दुर्गा। कहा जाता है कि दस भुजाओं वाली देवी ने नौ दिन तक युद्ध किया और दसवें दिन महिषासुर का वध किया। यही वजह है कि इसे बुराई पर अच्छाई की जीत माना जाता है।

अकाल बोधन: असमय जगाई गई देवी

बंगाल की पूजा की एक ख़ास बात है अकाल बोधन। परंपरागत रूप से दुर्गा की पूजा वसंत में होती थी, जिसे आज भी बसंती पूजा कहते हैं। लेकिन मान्यता है कि रावण से युद्ध से पहले भगवान राम ने शरद ऋतु में, यानी असमय, देवी को जगाकर उनकी आराधना की थी। इसीलिए शरद की ये पूजा “अकाल बोधन” कहलाती है, और बंगाल इसी को बड़े स्तर पर मनाता है।

जब पूजा घर से निकलकर सार्वजनिक हुई

अब आते हैं ऐतिहासिक पहलू पर। माना जाता है कि बंगाल में बड़े पैमाने पर दुर्गा पूजा ज़मींदार और राजपरिवारों के घरों में शुरू हुई। कोलकाता के बारिशा का सबर्ण रॉय चौधरी परिवार अपनी पूजा को लगभग सत्रहवीं सदी की शुरुआत से जोड़ता है। इसके अलावा शोभाबाज़ार राजबाड़ी की पूजा भी बहुत मशहूर है, जिसे राजा नबकृष्ण देब से जोड़ा जाता है। उस दौर में ये पूजा अपनी शान और रुतबा दिखाने का भी ज़रिया बन गई थी।

फिर आया बारोयारी पूजा का दौर। कहा जाता है कि हुगली के गुप्तिपाड़ा में बारह दोस्तों ने मिलकर चंदा इकट्ठा किया और सामूहिक रूप से पूजा की। यहीं से “बारो-यारी”, यानी बारह यारों वाली पूजा का चलन शुरू हुआ। आगे चलकर यही सार्वजनिक पूजा बने, जिन्हें आज हम सामुदायिक पूजा या पाड़ा की पूजा कहते हैं। धीरे-धीरे ये सिर्फ़ धार्मिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि पूरे समाज का उत्सव बन गया।

और हाँ, गर्व की बात ये भी है कि साल 2021 में यूनेस्को ने कोलकाता की दुर्गा पूजा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया।

दुर्गा पूजा की रस्में: दिन-ब-दिन क्या होता है?

अब असली मज़ा यहाँ से शुरू होता है। दुर्गा पूजा की रस्में पूरे पाँच दिन चलती हैं, लेकिन माहौल उससे पहले ही बनने लगता है।

महालया: पूजो की असली शुरुआत

महालया वो दिन है जब माना जाता है कि देवी धरती पर आने की तैयारी करती हैं। बंगाल में इस दिन की सुबह का मतलब है रेडियो पर “महिषासुरमर्दिनी” का पाठ। कई घरों में आज भी सुबह चार बजे उठकर ये सुना जाता है, और सच बताऊँ तो उस आवाज़ को सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इसी दिन मूर्तिकार देवी की आँखें बनाते हैं, जिसे चक्खुदान कहते हैं। माना जाता है कि आँखें बनते ही मूर्ति में प्राण आ जाते हैं।

षष्ठी: देवी का आगमन

षष्ठी के दिन बोधन होता है, यानी देवी को औपचारिक रूप से जगाया जाता है। पंडालों के पट खुलते हैं, ढाक बजने लगते हैं और पूजा विधिवत शुरू हो जाती है। इसी दिन कई जगह देवी का मुख ढका हुआ होता है और फिर उसे खोला जाता है, जो अपने आप में बड़ा भावुक पल होता है।

सप्तमी: कोलाबऊ स्नान

सप्तमी की सुबह एक बहुत अनोखी रस्म होती है, जिसे नबपत्रिका स्नान या आम बोलचाल में “कोलाबऊ स्नान” कहते हैं। इसमें नौ तरह के पौधों को, जिनमें केले का पौधा मुख्य होता है, गंगाजल या नदी के पानी से स्नान कराया जाता है। फिर उसे लाल किनारी वाली सफ़ेद साड़ी पहनाकर गणेश जी के पास बिठाया जाता है। कई लोग इसे “गणेश की बहू” कहकर मज़ाक में बुलाते हैं, लेकिन असल में ये देवी के प्रकृति रूप का प्रतीक है।

अष्टमी: अंजलि और कुमारी पूजा

अष्टमी को बंगाल में सबसे बड़ा दिन माना जाता है। सुबह-सुबह नए कपड़े पहनकर लोग पंडाल पहुँचते हैं और पुष्पांजलि देते हैं। लड़के-लड़कियाँ, बूढ़े-बच्चे, सब लाइन में खड़े होकर फूल चढ़ाते हैं। इसी दिन कुमारी पूजा भी होती है, जिसमें एक छोटी कन्या को देवी का रूप मानकर पूजा जाता है।

संधि पूजा: अष्टमी और नवमी का संगम

अष्टमी के अंत और नवमी की शुरुआत के बीच के लगभग 48 मिनट बहुत पवित्र माने जाते हैं। इसे संधि पूजा कहते हैं। मान्यता है कि इसी समय देवी ने चंड और मुंड नाम के असुरों का वध किया था। इस दौरान 108 दीये जलाए जाते हैं और 108 कमल के फूल चढ़ाए जाते हैं। पंडाल में उस वक़्त जो शांति और ऊर्जा महसूस होती है, उसे शब्दों में बताना थोड़ा मुश्किल है।

नवमी और दशमी: विदाई की घड़ी

नवमी को हवन और आरती होती है। फिर आता है दशमी का दिन, यानी बिजोया दशमी, जब माँ को विदा किया जाता है। यही वो दिन है जब पंडालों में थोड़ी उदासी भी घुल जाती है, क्योंकि बंगाल के लोग देवी को अपनी बेटी की तरह मानते हैं, जो चार दिन के लिए मायके आई थी।

सिंदूर खेला और धुनुची नाच: जो दिखता है, वो भूलता नहीं

अगर आपने बंगाल की पूजा की तस्वीरें देखी हैं, तो दो चीज़ें ज़रूर याद होंगी।

सिंदूर खेला: दशमी के दिन विवाहित महिलाएँ देवी के माथे पर सिंदूर लगाती हैं, उन्हें मिठाई खिलाती हैं और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। लाल-सफ़ेद साड़ियों में सजी महिलाएँ, चेहरे पर सिंदूर और हँसी, ये नज़ारा हर साल वायरल हो जाता है। इसका मक़सद सुहाग की लंबी उम्र और खुशहाली की कामना करना है। अब कई जगह अविवाहित और अलग-अलग पृष्ठभूमि की महिलाएँ भी इसमें शामिल होती हैं, जो अच्छा बदलाव है।

धुनुची नाच: धुनुची मिट्टी का एक बर्तन होता है जिसमें नारियल की जटा और धूप जलाई जाती है। लोग उसे हाथ में लेकर ढाक की ताल पर नाचते हैं। नवमी और अष्टमी की आरती के बाद ये नाच अक्सर होता है। शुरुआत में लगता है कि ये आसान है, लेकिन जलती धुनुची संभालते हुए नाचना सच में हुनर का काम है।

पंडाल की खासियत: जहाँ आर्ट और भक्ति मिलते हैं

बंगाल की पूजा का सबसे बड़ा आकर्षण पंडाल हैं। यहाँ पंडाल सिर्फ़ एक तंबू नहीं होता, बल्कि पूरा आर्ट इंस्टॉलेशन होता है।

थीम पंडाल का ट्रेंड

हर साल कोलकाता के पंडाल किसी न किसी थीम पर बनते हैं। कहीं बाँस और रस्सियों से किसी ऐतिहासिक इमारत की हूबहू नक़ल तैयार होती है, कहीं मिट्टी के बर्तनों से पूरा महल बनता है, तो कहीं सामाजिक मुद्दों को थीम बनाया जाता है, जैसे पर्यावरण, प्रवासी मज़दूर या महिला सशक्तिकरण। कुछ पंडालों में तो रोशनी, संगीत और कलाकृतियों का इतना शानदार इस्तेमाल होता है कि लगता है आप किसी म्यूज़ियम में घूम रहे हैं।

कुमारटुली: जहाँ मूर्तियाँ जन्म लेती हैं

उत्तर कोलकाता की कुमारटुली गली मूर्तिकारों का पुराना ठिकाना है। यहाँ गंगा की मिट्टी, बाँस और पुआल से मूर्तियाँ बनती हैं। महालया से कुछ हफ़्ते पहले यहाँ घूमने का अलग ही अनुभव होता है, जब आधी बनी मूर्तियाँ कतार में खड़ी रहती हैं। अगर आपको फ़ोटोग्राफ़ी या कला पसंद है, तो ये जगह ज़रूर देखनी चाहिए।

पंडाल हॉपिंग का मज़ा

बंगाली लोग पूजा में पंडाल हॉपिंग करते हैं, यानी एक रात में कई पंडाल घूमना। उत्तर कोलकाता के पुराने पंडाल पारंपरिक लुक के लिए जाने जाते हैं, जबकि दक्षिण कोलकाता के पंडाल थीम और भव्यता के लिए। भीड़ बहुत होती है, इसलिए आरामदायक जूते पहनिए और पानी साथ रखिए।

खाने के बिना पूजो अधूरी है

मान लीजिए आप बंगाल गए और भोग नहीं खाया, तो सच में आपकी यात्रा अधूरी रह गई। अष्टमी और नवमी को पंडालों में भोग बाँटा जाता है, जिसमें आमतौर पर खिचड़ी, लाबड़ा (मिक्स सब्ज़ी), टमाटर की चटनी और पायेश यानी खीर होती है।

इसके अलावा बाहर स्ट्रीट फ़ूड का अलग ही रंग रहता है, जैसे फुचका, काठी रोल, घुगनी, मुगलई पराठा, मिष्टी दोई और रसगुल्ला। लोग कहते हैं कि पूजो के चार दिन कैलोरी गिनना मना है, और मैं भी इससे सहमत हूँ।

पूजो की शॉपिंग और नए कपड़े

बंगाल में पूजा का मतलब नए कपड़े भी है। लोग महीनों पहले से शॉपिंग शुरू कर देते हैं। हर दिन के लिए अलग ड्रेस प्लान होती है, जैसे अष्टमी की सुबह के लिए पारंपरिक सफ़ेद-लाल साड़ी या धोती-कुर्ता। गिफ़्ट देने का भी रिवाज है, ख़ासकर बड़ों और बच्चों को कपड़े देना। इसी वजह से इन दिनों बाज़ारों में रौनक देखने लायक होती है।

पूजा के दौरान घूमने जाएँ तो क्या ध्यान रखें?

अगर आप पहली बार बंगाल की पूजा देखने जा रहे हैं, तो कुछ बातें काम आएँगी। सबसे अच्छा समय सुबह जल्दी या देर रात का होता है, जब भीड़ थोड़ी कम होती है। अष्टमी की शाम सबसे ज़्यादा भीड़ वाली मानी जाती है। मेट्रो और स्थानीय परिवहन का इस्तेमाल करें, क्योंकि कई सड़कें बंद हो जाती हैं। साथ ही पंडाल के अंदर तस्वीर लेने से पहले आसपास के नियम देख लें और धक्का-मुक्की से बचें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1. बंगाल में दुर्गा पूजा कितने दिन तक मनाई जाती है?

मुख्य पूजा षष्ठी से दशमी तक, यानी पाँच दिन चलती है। लेकिन महालया से ही माहौल शुरू हो जाता है और कई जगह तैयारियाँ महीनों पहले शुरू हो जाती हैं।

2. बंगाल में दुर्गा पूजा कब मनाई जाती है?

ये आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष में, यानी आमतौर पर सितंबर के अंत से अक्टूबर के बीच पड़ती है। हर साल तारीख़ें बदलती हैं, इसलिए कैलेंडर देखना ज़रूरी है।

3. दुर्गा पूजा का इतिहास कितना पुराना है?

बंगाल में पारिवारिक पूजा की परंपरा कई सौ साल पुरानी मानी जाती है। सार्वजनिक या बारोयारी पूजा बाद में शुरू हुई और समय के साथ बहुत बड़ा रूप ले लिया।

4. महालया का क्या महत्व है?

महालया को पूजा की औपचारिक शुरुआत माना जाता है। इस दिन “महिषासुरमर्दिनी” का पाठ सुना जाता है और मूर्तियों में चक्खुदान किया जाता है।

5. सिंदूर खेला क्या होता है?

ये दशमी के दिन की रस्म है, जिसमें महिलाएँ देवी को सिंदूर लगाकर एक-दूसरे के साथ सिंदूर से खेलती हैं और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

6. संधि पूजा कब होती है?

अष्टमी और नवमी तिथि के संगम पर लगभग 48 मिनट के लिए। इसका सटीक समय हर साल पंचांग के हिसाब से बदलता है।

7. कोलकाता में दुर्गा पूजा देखने का सबसे अच्छा समय कौन-सा है?

सप्तमी से नवमी के बीच। भीड़ से बचना हो तो सुबह जल्दी या देर रात जाना बेहतर रहता है।

8. क्या बंगाल की दुर्गा पूजा और नवरात्रि एक ही हैं?

दोनों एक ही समय के आसपास आते हैं, लेकिन मनाने का तरीक़ा अलग है। नवरात्रि में नौ दिन व्रत, गरबा या रामलीला का चलन ज़्यादा है, जबकि बंगाल में षष्ठी से दशमी तक पंडाल, मूर्ति पूजा और सांस्कृतिक उत्सव का माहौल रहता है।

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Laxmi Nautiyal

लक्ष्मी नौटियाल पिछले 5 सालों से कंटेंट राइटर के तौर पर काम कर रही हैं। उन्हें न्यूज, राजनीति, शिक्षा, मनोरंजन, खेल, बिजनेस और लाइफस्टाइल जैसे विषयों पर लिखने का अच्छा अनुभव है। वह इससे पहले कई वेबसाइट्स के लिए काम कर चुकी हैं। उनका मुख्य उद्देश्य पाठकों तक सही, उपयोगी और आसान भाषा में जानकारी पहुंचाना है। वह हर विषय पर रिसर्च करके ऐसा कंटेंट लिखने की कोशिश करती हैं, जिसे पाठक आसानी से समझ सकें और जिससे उन्हें जरूरी जानकारी मिल सके।

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