Nalanda University History: जब दुनिया के ज़्यादातर हिस्सों में विश्वविद्यालय जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी, तब बिहार में एक ऐसा शिक्षा केंद्र चल रहा था जहाँ हज़ारों विद्यार्थी साथ पढ़ते थे। यह था नालंदा विश्वविद्यालय, जिसे प्राचीन भारत की शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी पहचान माना जाता है।
चीन, कोरिया, जापान, तिब्बत और श्रीलंका जैसे देशों से लोग महीनों का सफ़र करके यहाँ ज्ञान लेने आते थे। बौद्ध दर्शन के साथ यहाँ तर्कशास्त्र, व्याकरण, चिकित्सा, गणित और खगोल विज्ञान की भी पढ़ाई होती थी।
करीब छह सदियों तक नालंदा ज्ञान की रोशनी फैलाता रहा। फिर एक दौर ऐसा आया जब इसकी इमारतें खंडहर बन गईं और यह कहानी इतिहास की किताबों में सिमट गई। आइए, Nalanda University के इतिहास को शुरुआत से पतन तक आसान भाषा में समझते हैं।
नालंदा विश्वविद्यालय की शुरुआत कब और कैसे हुई
नालंदा विश्वविद्यालय बिहार की राजधानी पटना से लगभग 95 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में, राजगीर के पास स्थित था। यह इलाका प्राचीन मगध का हिस्सा था, जो बौद्ध और जैन, दोनों परंपराओं के लिए बहुत अहम रहा है। बुद्ध के प्रमुख शिष्य सारिपुत्र का जन्म भी नालंदा के पास बताया जाता है।
इतिहासकार मानते हैं कि इस महाविहार की नींव पाँचवीं सदी में गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम के समय पड़ी। खुदाई में मिली मुहरें भी इसी ओर इशारा करती हैं। गुप्त काल में कला, विज्ञान और साहित्य खूब फले-फूले, इसीलिए इसे भारत का स्वर्ण युग कहा जाता है। ऐसे माहौल में नालंदा जैसे बड़े शिक्षा केंद्र का उभरना स्वाभाविक था।
नाम को लेकर एक लोकप्रिय व्याख्या है “न अलं दा”, यानी “देने में कोई कमी नहीं”। हालाँकि इतिहासकार इसकी उत्पत्ति पर एकमत नहीं हैं।
ख़ास बात यह है कि नालंदा, ऑक्सफ़ोर्ड और बोलोग्ना जैसे यूरोप के पुराने विश्वविद्यालयों से सदियों पहले का है। इसे दुनिया के सबसे शुरुआती आवासीय विश्वविद्यालयों में गिना जाता है, जहाँ विद्यार्थी और शिक्षक परिसर में ही रहते थे।
नालंदा विश्वविद्यालय की कुछ ख़ास बातें
अगर नालंदा को एक नज़र में समझना हो, तो ये बातें सबसे ज़रूरी हैं:
- कहाँ था: बिहार में राजगीर के पास, प्राचीन मगध क्षेत्र में
- कब बना: पाँचवीं सदी में, गुप्त काल के दौरान
- कितना पुराना: ऑक्सफ़ोर्ड और बोलोग्ना जैसे यूरोपीय विश्वविद्यालयों से सदियों पुराना
- कितने विद्यार्थी: ह्वेनसांग के अनुसार करीब दस हज़ार
- कितने शिक्षक: डेढ़ हज़ार से ज़्यादा
- पढ़ाई का खर्च: राजाओं और गाँवों के दान से चलता था, विद्यार्थियों के लिए मुफ़्त
- कौन-कौन आता था: चीन, कोरिया, जापान, तिब्बत और श्रीलंका जैसे देशों से विद्यार्थी
- विश्व धरोहर: 2016 में यूनेस्को ने इसके अवशेषों को यह दर्जा दिया
नालंदा में क्या-क्या पढ़ाया जाता था
नालंदा मूल रूप से एक बौद्ध महाविहार था, इसलिए महायान बौद्ध दर्शन की पढ़ाई सबसे अहम थी। लेकिन पढ़ाई सिर्फ़ धर्म तक सीमित नहीं थी। चीनी यात्रियों के विवरणों से पता चलता है कि यहाँ ये विषय भी पढ़ाए जाते थे:
- वेद और सांख्य-योग दर्शन
- तर्कशास्त्र और व्याकरण
- चिकित्सा
- गणित और खगोल विज्ञान
आज की भाषा में कहें तो यह एक बहु-विषयक विश्वविद्यालय था।
पढ़ाई का तरीका भी अलग था। यहाँ रटने पर नहीं, बहस और शास्त्रार्थ पर ज़ोर था। विद्यार्थी अपने गुरुओं से सवाल करते, तर्क रखते और अपनी बात साबित करते थे। ह्वेनसांग के अनुसार यहाँ रोज़ सौ के करीब व्याख्यान और चर्चाएँ होती थीं।
दाख़िला आसान नहीं था
नालंदा में पढ़ने का सपना हर किसी का पूरा नहीं होता था। विहार के द्वार पर विद्वान द्वारपंडित बैठते थे, जो आने वाले हर विद्यार्थी की परीक्षा लेते थे। कहा जाता है कि इस कठिन परीक्षा में बहुत कम लोग सफल हो पाते थे।
जो चुन लिए जाते, उनकी पढ़ाई और रहने-खाने की व्यवस्था मुफ़्त थी। इसका खर्च आसपास के गाँवों से मिलने वाले दान और राजाओं के अनुदान से चलता था।
नालंदा के महान आचार्य
इस विश्वविद्यालय की पहचान उसके विद्वानों से भी थी। धर्मपाल, शीलभद्र, धर्मकीर्ति, चंद्रकीर्ति और शांतरक्षित जैसे आचार्यों के नाम नालंदा की परंपरा से जुड़े हैं।
इनमें से कई ने बौद्ध तर्कशास्त्र और दर्शन को ऐसी ऊँचाई दी कि उनके ग्रंथ आज भी पढ़े जाते हैं। शांतरक्षित का असर तो तिब्बत तक पहुँचा। इन्हीं आचार्यों की वजह से नालंदा पूरे एशिया में बौद्ध शिक्षा का केंद्र बन गया।
ह्वेनसांग और ईत्सिंग की नज़र से नालंदा
Nalanda University के बारे में हमारी जानकारी का बड़ा हिस्सा चीनी यात्रियों के लेखन से आता है।
सातवीं सदी में चीनी भिक्षु ह्वेनसांग यहाँ लगभग पाँच साल रहे और उस समय के कुलपति शीलभद्र से शिक्षा ली। लौटते समय वे सैकड़ों पांडुलिपियाँ अपने साथ ले गए, जिनका बाद में चीनी भाषा में अनुवाद करवाया गया।
कुछ दशक बाद भिक्षु ईत्सिंग यहाँ करीब दस साल रहे। उन्होंने नालंदा के अनुशासन और रहन-सहन के बारे में विस्तार से लिखा। उनके अनुसार विहार का जीवन बहुत नियमित था और पढ़ाई तथा साधना, दोनों पर बराबर ध्यान दिया जाता था।
नालंदा की ख्याति समुद्र पार तक थी। यहाँ से मिले एक ताम्रपत्र के अनुसार सुमात्रा के शैलेंद्र वंश के राजा बालपुत्रदेव ने यहाँ विहार बनवाने की इच्छा जताई थी, और पाल राजा देवपाल ने इसकी अनुमति दी थी।
धर्मगंज: नालंदा का विशाल पुस्तकालय
नालंदा की सबसे मशहूर पहचान उसका पुस्तकालय है, जिसे धर्मगंज कहा जाता था। तिब्बती स्रोतों के अनुसार यह तीन बड़ी इमारतों में फैला था, जिनके नाम रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक बताए जाते हैं। इनमें रत्नोदधि को नौ मंज़िला कहा गया है।
ये विवरण काफ़ी हद तक बाद के लेखकों की परंपरा पर आधारित हैं, इसलिए किताबों की सही गिनती कोई नहीं बता सकता। पर इतना तय है कि यहाँ हाथ से लिखी पांडुलिपियों का बहुत बड़ा संग्रह था।
उस दौर में छपाई नहीं थी। हर किताब ताड़पत्र या भोजपत्र पर हाथ से लिखी जाती थी, और विद्यार्थी व भिक्षु ग्रंथों की नकल तैयार करते थे। इन्हीं प्रतियों के ज़रिए भारतीय दर्शन, गणित और चिकित्सा के विचार तिब्बत और पूर्वी एशिया तक पहुँचे।
नालंदा महाविहार की बनावट
खुदाई में मिले अवशेष बताते हैं कि यह परिसर बहुत सोच-समझकर बसाया गया था। यहाँ लाल ईंटों से बनी मज़बूत इमारतें मिलती हैं। परिसर में लगभग ग्यारह विहार और कई मंदिर एक सीधी कतार में बने थे।
हर विहार में भिक्षुओं के लिए छोटे-छोटे कमरे थे और बीच में खुला आँगन। विहारों के बीच कुएँ और खुली जगहें भी थीं। इन्हें देखकर लगता है कि यह कोई साधारण मठ नहीं, बल्कि एक सुनियोजित शैक्षिक नगर था।
राजाओं का संरक्षण और स्वर्णकाल
कोई भी बड़ा शिक्षा केंद्र बिना सहारे के नहीं चल सकता। नालंदा को कई राजवंशों का साथ मिला:
- गुप्त वंश: इन्होंने नींव रखी और इसे मज़बूत किया
- हर्षवर्धन (सातवीं सदी): ह्वेनसांग के अनुसार उन्होंने विहार के खर्च के लिए कई गाँवों की आमदनी दान की
- पाल वंश (आठवीं से बारहवीं सदी): बौद्ध धर्म के बड़े संरक्षक, जिन्होंने नालंदा को दान दिया और विक्रमशिला तथा ओदंतपुरी जैसे नए विहार भी बनवाए
इसी दौर में नालंदा विश्वविद्यालय अपनी ख्याति के शिखर पर रहा।
नालंदा के पतन की कहानी
अब उस हिस्से की बात, जिस पर सबसे ज़्यादा चर्चा होती है।
लोकप्रिय कहानी यह है कि बारहवीं सदी के अंत में बख़्तियार ख़िलजी ने नालंदा पर हमला किया और इसे आग लगा दी। कहा जाता है कि पुस्तकालय महीनों तक जलता रहा। यह कहानी बहुत प्रचलित है, लेकिन इतिहास इससे ज़्यादा उलझा हुआ है।
सबसे पहले तो नालंदा को नुकसान ख़िलजी से बहुत पहले भी पहुँच चुका था। परंपरा के अनुसार छठी सदी में हूण शासक मिहिरकुल के हमले में इसे चोट पहुँची, जिसके बाद इसे दोबारा बनवाया गया। कुछ स्रोत गौड़ राजा शशांक के समय भी नुकसान की बात करते हैं। यानी यह संस्था अपने जीवनकाल में कई बार टूटी और हर बार फिर खड़ी हुई।
उस समय के इतिहासकार मिन्हाज-ए-सिराज ने बिहार के एक किले पर हुए हमले का ज़िक्र किया है। उसके अनुसार वहाँ बड़ी संख्या में मुंडन किए हुए भिक्षु मारे गए और किताबों का बड़ा भंडार भी मिला। लेकिन उसने नालंदा का नाम सीधे नहीं लिया, इसी वजह से कई इतिहासकार मानते हैं कि वह जगह ओदंतपुरी हो सकती है।
फिर भी बहुत-से विद्वान मानते हैं कि इसी दौर में तुर्क हमलावरों के हाथों नालंदा को भी भारी नुकसान पहुँचा। बारहवीं सदी के अंत के आसपास नालंदा बर्बादी का शिकार हुआ, यह पक्का माना जा सकता है, पर हर ब्योरे को पूरे भरोसे से नहीं कहा जा सकता।
एक और दिलचस्प बात यह है कि हमले के बाद भी नालंदा तुरंत ख़त्म नहीं हुआ। तिब्बती यात्री धर्मस्वामिन करीब 1235 में यहाँ आए और उन्होंने राहुल श्रीभद्र नाम के बुज़ुर्ग आचार्य को लगभग सत्तर विद्यार्थियों को पढ़ाते देखा। यानी पढ़ाई जारी थी, पर पुराना वैभव नहीं बचा था।
नालंदा के पतन के असली कारण
असल में नालंदा विश्वविद्यालय का पतन सिर्फ़ एक हमले से नहीं हुआ। इसके पीछे कई कारण साथ-साथ काम कर रहे थे:
- राजकीय संरक्षण का ख़त्म होना: पाल वंश कमज़ोर होने के बाद विहारों को मिलने वाला दान और सुरक्षा घटती गई
- बौद्ध धर्म का कमज़ोर पड़ना: भारत में बौद्ध धर्म का प्रभाव घट रहा था, जिससे विहारों का सामाजिक आधार भी सिमटता गया
- राजनीतिक अस्थिरता: उत्तर भारत में नए हमलावरों और बदलती सत्ता के कारण शिक्षा संस्थानों के लिए हालात मुश्किल हो गए
- दूसरे केंद्रों का उभरना: विक्रमशिला और ओदंतपुरी भी उस दौर में प्रमुख थे, और कुछ समय बाद वे भी इसी तरह तबाह हुए
इन सबके मेल से नालंदा धीरे-धीरे अपनी चमक खोता गया। सदियों बाद इसके खंडहर मिट्टी और टीलों के नीचे दब गए और लोग इसे लगभग भूल गए।
खंडहरों से दोबारा खोज
उन्नीसवीं सदी में ब्रिटिश सर्वेक्षक अलेक्ज़ेंडर कनिंघम ने इस जगह की पहचान नालंदा के रूप में की। इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने बीसवीं सदी में कई चरणों में खुदाई करवाई, जिसमें विहार, मंदिर, स्तूप, कुएँ और मुहरें सामने आईं। इन्होंने किताबों में पढ़ी बातों को ज़मीन पर साबित कर दिया।
साल 2016 में यूनेस्को ने नालंदा महाविहार के पुरातात्विक अवशेषों को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया। आज यहाँ हर साल बड़ी संख्या में पर्यटक और इतिहास प्रेमी पहुँचते हैं। ऊँची दीवारें, छोटे-छोटे कमरे और खुले आँगन आज भी उस दौर की झलक देते हैं।
नया नालंदा विश्वविद्यालय
इस विरासत को नई ज़िंदगी देने की कोशिश भी हुई। साल 2010 में भारतीय संसद ने नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम पारित किया, जिसके तहत राजगीर के पास नया नालंदा विश्वविद्यालय शुरू हुआ। इसकी पढ़ाई 2014 में कुछ गिने-चुने विद्यार्थियों के साथ शुरू हुई और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन इसके पहले कुलाधिपति बने।
जून 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसके नए परिसर का उद्घाटन किया। यह नया विश्वविद्यालय प्राचीन खंडहरों के पास ही बना है और कई एशियाई देशों के सहयोग से आगे बढ़ रहा है।
प्राचीन नालंदा की तरह आज के नालंदा से भी यही उम्मीद है कि वह दुनिया भर के विद्यार्थियों को एक जगह लाकर ज्ञान और संवाद का केंद्र बने।
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