Historical Places in Bihar : बिहार का नाम सुनते ही बहुत लोगों को पहले राजनीति या छठ पूजा याद आती है। पर सच यह है कि इस राज्य की मिट्टी में इतिहास इतना गहरा दबा है कि किसी भी ज़िले में चले जाइए, कुछ न कुछ पुराना मिल ही जाएगा। यहीं बुद्ध को ज्ञान मिला, यहीं महावीर ने निर्वाण पाया, और यहीं से मौर्य सम्राटों ने लगभग पूरा भारत चलाया। गुरु गोबिंद सिंह का जन्म भी बिहार में हुआ और गांधी जी ने भारत में अपना पहला बड़ा सत्याग्रह भी यहीं से शुरू किया। तो अगर आप ऐसी जगहें ढूँढ रहे हैं जहाँ सिर्फ़ फ़ोटो न खिंचे, कुछ जानने-समझने को भी मिले, तो बिहार के ऐतिहासिक स्थलों की यह लिस्ट आपके काम की है। चलिए, एक-एक करके देखते हैं।
घूमने से पहले ये बातें जान लीजिए
- अक्टूबर से मार्च का मौसम सबसे अच्छा रहता है। गर्मियों में खंडहरों के बीच धूप सीधे सिर पर लगती है।
- पटना और गया दो सबसे सुविधाजनक ठिकाने हैं। ज़्यादातर जगहें इन्हीं दोनों से एक दिन में निपट जाती हैं।
- नालंदा, राजगीर और पावापुरी एक ही दिन में घूमे जा सकते हैं, पर जल्दी निकलना पड़ेगा।
- खुले परिसरों में पानी और टोपी साथ रखिए, और आरामदायक जूते पहनिए।
1. नालंदा के खंडहर

प्राचीन नालंदा महाविहार पाँचवीं सदी के आसपास बना था और सदियों तक एशिया भर के विद्यार्थियों को खींचता रहा। आज वहाँ लाल ईंटों की दीवारें, भिक्षुओं के छोटे कमरे और खुले आँगन बचे हैं। 2016 में इसे यूनेस्को ने विश्व धरोहर का दर्जा दिया। खंडहरों में टहलते हुए ऐसा लगता है कि कोई अभी किसी कमरे से निकल आएगा। इसके इतिहास पर हमारा अलग आर्टिकल भी है, चाहें तो उसे पढ़ लें।
2. बोधगया का महाबोधि मंदिर

यह बौद्ध धर्म के सबसे पवित्र स्थानों में से एक है, क्योंकि यहीं बोधि वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को ज्ञान मिला था। मंदिर का मौजूदा रूप गुप्त काल का माना जाता है और इसे 2002 में यूनेस्को की सूची में शामिल किया गया। शाम को जब परिसर में दीये जलते हैं और दुनिया भर से आए भिक्षु ध्यान में बैठे दिखते हैं, तो माहौल अपने आप शांत हो जाता है। आसपास कई देशों के बनवाए मठ भी हैं, जैसे जापान, थाईलैंड और भूटान के।
3. राजगीर

राजगीर कभी मगध की राजधानी हुआ करता था, जब यहाँ राजा बिम्बिसार का शासन था। यहाँ एक साथ कई चीज़ें देखने को मिलती हैं। गृद्धकूट पहाड़ी है, जहाँ बुद्ध उपदेश दिया करते थे। रत्नगिरि पर विश्व शांति स्तूप है, जहाँ रोपवे से पहुँचा जाता है। शहर के चारों ओर पत्थरों की बहुत पुरानी दीवार के अवशेष भी हैं और गर्म पानी के कुंड भी। जैन और बौद्ध, दोनों परंपराओं के लिए यह जगह ख़ास है, इसलिए यहाँ एक दिन से ज़्यादा रुकना बेकार नहीं जाएगा।
4. वैशाली
वैशाली को अक्सर दुनिया के सबसे पुराने गणराज्यों में गिना जाता है, जहाँ लिच्छवियों का शासन था। यहाँ अशोक का बनवाया स्तंभ खड़ा है, जिसके ऊपर एक अकेला सिंह बैठा है। पास में बुद्ध के अवशेषों से जुड़ा स्तूप और अभिषेक पुष्करिणी नाम का पुराना तालाब भी है। कहा जाता है कि बुद्ध ने यहीं से अपनी आख़िरी यात्रा के लिए विदा ली थी। जगह शांत है, भीड़ कम है, और तसल्ली से देखने लायक है।
5. विक्रमशिला के अवशेष

भागलपुर ज़िले के अंतीचक गाँव में विक्रमशिला महाविहार के खंडहर हैं। इसे पाल राजा धर्मपाल ने आठवीं-नौवीं सदी के आसपास बनवाया था। एक समय यह नालंदा के बाद देश का सबसे बड़ा बौद्ध शिक्षा केंद्र था, और विद्वान अतीश दीपंकर का नाम भी इससे जुड़ा है। यहाँ एक बहुत बड़ा केंद्रीय स्तूप और चारों तरफ़ बने कमरों की कतार दिखती है। पास में एक छोटा संग्रहालय भी है, जहाँ खुदाई में मिली चीज़ें रखी हैं।
6. केसरिया स्तूप

पूर्वी चंपारण के केसरिया में बना यह स्तूप भारत के सबसे ऊँचे बौद्ध स्तूपों में गिना जाता है। इसकी मौजूदा ऊँचाई करीब 104 फ़ीट बताई जाती है। हालाँकि खुदाई के बाद भी पूरा स्तूप बाहर नहीं निकला है, बहुत-सा हिस्सा अब भी मिट्टी में दबा है। दूर से देखने पर यह किसी बड़े टीले जैसा लगता है, पर पास जाकर इसकी परतें और ईंटों का ढाँचा साफ़ दिखता है। भीड़ यहाँ कम ही मिलेगी, जो अपने आप में एक फ़ायदा है।
7. बराबर की गुफाएँ
जहानाबाद ज़िले की पहाड़ियों में बनी ये गुफाएँ मौर्य काल की हैं और इन्हें भारत की सबसे पुरानी चट्टान काटकर बनी गुफाओं में गिना जाता है। गुफाओं के अंदर की दीवारें शीशे जैसी चिकनी पॉलिश की गई हैं, और अंदर आवाज़ अजीब तरह से गूँजती है। इनमें लोमस ऋषि और सुदामा जैसी गुफाएँ मशहूर हैं। इन्हें आजीविक संप्रदाय के साधुओं के लिए बनवाया गया था। गुफाओं तक पहुँचने के लिए थोड़ी पहाड़ी चढ़ाई करनी पड़ती है, इसलिए जूते ठीक पहनिए।
8. रोहतासगढ़ क़िला

सोन नदी के किनारे कैमूर पठार पर फैला यह क़िला बहुत विशाल है। लोककथाओं में इसका संबंध राजा हरिश्चंद्र के बेटे रोहिताश्व से जोड़ा जाता है। इतिहास में शेरशाह सूरी ने 1530 के दशक के आख़िर में इस पर कब्ज़ा किया था, और बाद में अकबर के सेनापति मान सिंह ने इसे अपना ठिकाना बनाया। यहाँ पहाड़ पर महल, फाटक और मंदिर के अवशेष बिखरे पड़े हैं। पूरा क़िला देखने में आधा दिन आराम से निकल जाता है।
9. शेरशाह सूरी का मक़बरा, सासाराम
सासाराम में एक बनावटी झील के बीचोंबीच खड़ा यह लाल बलुआ पत्थर का मक़बरा देखने लायक है। शेरशाह की मृत्यु 1545 में हुई थी और इसे उसी के आसपास पूरा किया गया। इसकी ऊँचाई सवा सौ फ़ीट के क़रीब बताई जाती है। जब सुबह की धूप पानी पर पड़ती है, तो इमारत की परछाईं झील में उतर आती है। फ़ोटोग्राफ़ी के शौकीनों के लिए यह जगह किसी तोहफ़े से कम नहीं।
10. तख़्त श्री हरिमंदिर जी, पटना साहिब
यह सिख धर्म के पाँच तख़्तों में से एक है और दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्मस्थान माना जाता है। उनका जन्म 1666 में हुआ था। गुरुद्वारे का सफ़ेद संगमरमर वाला भवन बहुत साफ़-सुथरा और शांत है। यहाँ लंगर चलता है, जहाँ बैठकर खाने का अनुभव अलग ही होता है। सिर ढककर जाना होता है, इसलिए रूमाल या दुपट्टा साथ रखें।
11. गोलघर, पटना

गोलघर पटना की सबसे पहचानी जाने वाली इमारत है। इसे 1786 में कैप्टन जॉन गार्स्टिन ने अनाज रखने के लिए बनवाया था। 1770 के भयानक अकाल के बाद अंग्रेज़ों को डर था कि फिर ऐसा न हो जाए। इसमें कोई खंभा नहीं है, और बाहर बनी सीढ़ियाँ गोल घूमती हुई ऊपर जाती हैं, कुल करीब 145। ऊपर से गंगा का नज़ारा बहुत सुंदर दिखता है। मज़े की बात यह है कि इसे कभी पूरा भरा ही नहीं जा सका।
12. कुम्हरार, पटना
अगर आप जानना चाहते हैं कि पाटलिपुत्र कैसा था, तो कुम्हरार जाइए। यहाँ मौर्य काल के एक बहुत बड़े सभागार के अवशेष मिले हैं, जिसमें पत्थर के करीब 80 खंभे हुआ करते थे। खुदाई बीसवीं सदी की शुरुआत में हुई थी। आज ज़्यादातर हिस्सा ज़मीन के नीचे दबा है, पर जो दिखता है वह भी सोचने पर मजबूर करता है कि ढाई हज़ार साल पहले यहाँ कितनी बड़ी राजधानी रही होगी। पास में आरोग्य विहार के अवशेष भी हैं।
13. खुदा बख़्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी, पटना

यह कोई खंडहर नहीं, एक जीती-जागती लाइब्रेरी है, पर इसकी कहानी भी उतनी ही पुरानी और दिलचस्प है। इसे 1891 में खुदा बख़्श ख़ान ने आम लोगों के लिए खोला था। यहाँ अरबी, फ़ारसी और उर्दू की बहुत दुर्लभ पांडुलिपियाँ रखी हैं। किताबें पसंद हैं तो यहाँ आकर घंटा भर कब बीत जाएगा, पता नहीं चलेगा। गंगा किनारे बनी इस इमारत की शांति भी अलग है।
14. विष्णुपद मंदिर, गया
फल्गु नदी के किनारे बना यह मंदिर हिंदू आस्था का बड़ा केंद्र है। यहाँ काले पत्थर पर विष्णु के पदचिह्न माने जाने वाले निशान की पूजा होती है। गया पितृ पक्ष में पिंडदान के लिए देश भर में जाना जाता है, और उस दौरान यहाँ भारी भीड़ जुटती है। मंदिर का मौजूदा रूप 18वीं सदी में इंदौर की रानी अहिल्याबाई होल्कर ने बनवाया था। शांति से देखना हो तो पितृ पक्ष के बाहर का समय चुनिए।
15. मनेर शरीफ़
पटना से करीब 30 किलोमीटर दूर गंगा और सोन के संगम के पास बसा मनेर सूफ़ी संत मख़दूम याह्या मनेरी की दरगाह के लिए जाना जाता है। यहाँ दो दरगाहें हैं, बड़ी और छोटी। छोटी दरगाह की इमारत ख़ास तौर पर सुंदर है। मनेर अपने लड्डुओं के लिए भी मशहूर है, तो वापस लौटते समय डिब्बा ले जाना मत भूलिए।
16. मुंगेर का क़िला
गंगा किनारे बना मुंगेर का पुराना क़िला कई शासकों के हाथों से गुज़रा। बंगाल के नवाब मीर क़ासिम ने 1760 के दशक में इसे अपनी राजधानी बनाया था। आज क़िले के कुछ हिस्से और फाटक बचे हैं, और अंदर शहर बसा हुआ है। मुंगेर योग के लिए भी दुनिया भर में जाना जाता है, क्योंकि 1964 में यहीं बिहार स्कूल ऑफ़ योग की स्थापना हुई थी। इतिहास और योग, दोनों का स्वाद एक ही शहर में मिल जाता है।
17. पावापुरी का जल मंदिर

नालंदा ज़िले के पावापुरी में कमल के तालाब के बीच संगमरमर का यह मंदिर बना है। जैन परंपरा के अनुसार भगवान महावीर को यहीं निर्वाण प्राप्त हुआ था। मंदिर तक एक लंबे पुल से जाना पड़ता है, और तालाब में गर्मियों में कमल खिले रहते हैं। यह जगह राजगीर से ज़्यादा दूर नहीं है, इसलिए दोनों को साथ में देखना आसान है।
18. लौरिया नंदनगढ़
पश्चिम चंपारण के इस स्थान पर अशोक का एक पत्थर का स्तंभ है, जिसके ऊपर सिंह की आकृति बनी है। स्तंभ पर अशोक के लेख भी खुदे हैं। इसके पास ही नंदनगढ़ के बड़े-बड़े टीले हैं, जिन्हें स्तूप या प्राचीन इमारतों के अवशेष माना जाता है। भीड़ यहाँ लगभग नहीं होती, इसलिए आराम से घूमा जा सकता है। इतिहास में दिलचस्पी रखने वालों के लिए यह छिपा हुआ रत्न है।
19. भितिहरवा गांधी आश्रम, चंपारण
1917 में गांधी जी चंपारण आए थे, जहाँ नील की खेती करने वाले किसानों पर अंग्रेज़ों का भारी अत्याचार था। यहीं से उनका पहला बड़ा सत्याग्रह शुरू हुआ। भितिहरवा में उन्होंने एक स्कूल भी चलाया था, और आज वहाँ एक छोटा-सा आश्रम और स्मारक है। मिट्टी की सादी झोपड़ियाँ देखकर समझ आता है कि बड़े आंदोलन कभी-कभी कितनी साधारण जगहों से शुरू होते हैं।
20. मुंडेश्वरी मंदिर, कैमूर
कैमूर की पहाड़ी पर बना यह मंदिर अष्टकोणीय आकार का है, जो आम मंदिरों से अलग दिखता है। इसे देश के सबसे पुराने मंदिरों में गिना जाता है, और माना जाता है कि यहाँ पूजा सदियों से चलती आ रही है। हालाँकि इसकी सही उम्र को लेकर शिलालेखों के आधार पर अलग-अलग अनुमान मिलते हैं। पहाड़ी की चढ़ाई छोटी है और ऊपर से आसपास का नज़ारा अच्छा दिखता है।
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