जंतर-मंतर का नाम सुनते ही सबसे पहले क्या याद आता है? धरना, नारे, पुलिस की बैरिकेडिंग, है ना? लेकिन ये जगह असल में बनी थी तारों और समय को पढ़ने के लिए। तो फिर ये सरकार से सवाल पूछने की जगह कैसे बन गई? और अब अक्टूबर 2026 में यहाँ प्रदर्शनों को लेकर नया फैसला क्यों आया है? चलिए, पूरी बात आसान भाषा में समझते हैं।
जंतर-मंतर है क्या?
जंतर-मंतर का इतिहास कुछ ऐसा है कि इसे 18वीं सदी में महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने बनवाया था। ये एक observatory है, यानी आसमान और समय को नापने की वेधशाला। इसे धरना-प्रदर्शन के लिए तो कभी बनाया ही नहीं गया था। लेकिन ये दिल्ली में संसद के बहुत पास है, और यही बात आगे चलकर इसके काम आ गई।
जंतर-मंतर से पहले प्रदर्शन कहाँ होते थे?
एक वक़्त था जब दिल्ली के बड़े आंदोलन जंतर-मंतर पर नहीं, बल्कि राजपथ के पास Boat Club के लॉन पर होते थे। संसद और सरकारी दफ़्तर पास थे, इसलिए लोग वहीं जमा होते थे।
Boat Club पर रोक और जंतर-मंतर की शुरुआत
बदलाव 1988 में आया। उस साल महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में हज़ारों किसान कई दिन तक Boat Club के लॉन पर डटे रहे। इतनी बड़ी भीड़ से सुरक्षा की चिंता बढ़ी और प्रशासन ने धीरे-धीरे वहाँ बड़ी सभाओं पर रोक लगानी शुरू कर दी।
इसके बाद करीब 1993 तक जंतर-मंतर रोड दिल्ली का मुख्य प्रदर्शन स्थल बन गया। यहाँ से आवाज़ संसद तक पहुँचती थी, और प्रशासन के लिए भी इसे सँभालना आसान था।
अब एक ज़रूरी बात, जो अक्सर लोग ग़लत बता देते हैं। जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल बनाने वाला कोई एक कानून या आदेश कभी नहीं आया। ये धीरे-धीरे और बिना किसी औपचारिक घोषणा के बना। इसलिए “फलाँ तारीख को लागू हुआ” कहना सही नहीं होगा।
जंतर-मंतर के 9 बड़े आंदोलन
1. अन्ना हज़ारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन (2011)। अप्रैल 2011 में अन्ना हज़ारे ने मज़बूत Lokpal कानून की माँग को लेकर hunger strike शुरू की। अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण जैसे कई लोग इससे जुड़े और इसका असर देश की राजनीति पर लंबे समय तक रहा।

2. निर्भया न्याय प्रदर्शन (2012)। दिसंबर 2012 में निर्भया कांड के बाद जंतर-मंतर पर भी लोग इंसाफ़ माँगने पहुँचे। माँग थी कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए सख़्त कानून और बेहतर पुलिसिंग हो।
3. वन रैंक वन पेंशन, OROP (2015 से)। पूर्व सैनिकों ने OROP की माँग को लेकर यहाँ धरना शुरू किया, जो दो साल से ज़्यादा चला।
4. CAA विरोधी प्रदर्शन (2019)। दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ हज़ारों लोग यहाँ जुटे।
5. किसान संसद (2021)। 22 जुलाई से 9 अगस्त 2021 तक, संसद के मानसून सत्र के दौरान, संयुक्त किसान मोर्चा ने तीन कृषि कानूनों के विरोध में जंतर-मंतर पर अपनी “किसान संसद” लगाई। पुलिस की अनुमति से एक बार में 200 किसानों को बैठने की इजाज़त थी।
6. पहलवानों का धरना (2023)। विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पुनिया जैसे बड़े पहलवानों ने कुश्ती संघ के तत्कालीन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों की जाँच की माँग को लेकर यहाँ महीनों धरना दिया।
7. NEET पेपर लीक के ख़िलाफ़ प्रदर्शन (2024)। NEET-UG परीक्षा 5 मई 2024 को हुई, जिसमें करीब 24 लाख बच्चे बैठे थे। 4 जून को नतीजे आए और उसके बाद बिहार जैसे राज्यों में पेपर लीक के आरोप लगे। छात्रों और छात्र संगठनों ने जंतर-मंतर पर “24 लाख छात्र परीक्षा चाहते हैं, घोटाला नहीं” जैसे नारे लगाए और दोबारा परीक्षा (RENEET) और NTA पर कार्रवाई की माँग की।
8. Cockroach Janta Party (CJP) का छात्र आंदोलन (2026)। ये आंदोलन मई 2026 में सोशल मीडिया पर एक व्यंग्य (satire) की तरह शुरू हुआ और 6 जून 2026 को जंतर-मंतर पर सड़क पर उतर आया। इसके संस्थापक अभिजीत दिपके हैं। माँग थी कि NEET पेपर लीक और CBSE की on-screen marking में गड़बड़ियों की ज़िम्मेदारी लेते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफ़ा दें। 28 जून को सोनम वांगचुक भी hunger strike पर बैठे। आख़िर में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के बाद ये आंदोलन ख़त्म हुआ।
9. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की माँग (अक्टूबर 2026, अभी जारी)। CJP ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की माँग को लेकर नया प्रदर्शन बुलाया। आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण (SIR) में गड़बड़ियाँ हुईं। 10 अक्टूबर को पुलिस ने लोगों को जंतर-मंतर पर इकट्ठा होने से रोका और हज़ारों लोग हिरासत में लिए गए। 12 अक्टूबर को राहुल गांधी और INDIA ब्लॉक के नेताओं ने “March for Democracy” निकालकर सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया और SIR रुकवाने व मतदाता सूची के ऑडिट की माँग वाली याचिका दायर की। उधर CJP ने पुलिस से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की तारीख़ माँगी है और कहा है कि तारीख़ न मिली तो वो फिर प्रदर्शन का आह्वान करेगी।
रोक लगाने की कोशिश पहले भी हुई थी
5 अक्टूबर 2017 को National Green Tribunal (NGT) ने जंतर-मंतर के आसपास सभी धरने और प्रदर्शन बंद करा दिए थे और प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान भेजने को कहा था। इसके बाद OROP वाले पूर्व सैनिकों के तंबू भी हटा दिए गए।
लेकिन 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने मज़दूर किसान शक्ति संगठन के मामले में कहा कि जंतर-मंतर जैसी जगहों पर प्रदर्शन पर पूरी तरह रोक नहीं लग सकती। साथ ही ये भी कहा कि कोई किसी ख़ास जगह पर ही प्रदर्शन करने की ज़िद नहीं कर सकता और इसके लिए नियम बनाए जा सकते हैं। उसके बाद Delhi Police के SOP के तहत अनुमति लेकर वहाँ प्रदर्शन होते रहे। पुलिस के मुताबिक आज के SOP में ज़्यादा से ज़्यादा 1,000 लोगों को अनुमति मिल सकती है।
अब क्या हुआ? (अक्टूबर 2026)
इस साल जुलाई में CJP के “संसद चलो” मार्च के दौरान झड़पें हुईं। पुलिस सूत्रों के मुताबिक पत्थरबाज़ी में कुछ अधिकारी घायल हुए और 10 FIR दर्ज हुईं। दूसरी तरफ़ कुछ याचिकाओं में आरोप है कि पुलिस ने लाठी और आँसू गैस का ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल किया, और दिल्ली हाई कोर्ट ने इस पर केंद्र और पुलिस से जवाब माँगा है।
30 जुलाई को Delhi Police ने कहा था कि जंतर-मंतर बंद होने की ख़बरें झूठी हैं और ये जगह प्रदर्शन के लिए चालू है। अगस्त में सुप्रीम कोर्ट एक PIL सुनने को राज़ी हुआ, जिसमें कहा गया था कि जंतर-मंतर अब प्रदर्शन के लिए सही जगह नहीं रही, क्योंकि इससे आसपास के लोगों को परेशानी होती है। बाद में कोर्ट ने केंद्र से कोई बेहतर विकल्प तलाशने की बात भी कही।
फिर 10 अक्टूबर को CJP ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की माँग को लेकर प्रदर्शन बुलाया। उनके ख़िलाफ़ आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण (SIR) में गड़बड़ियाँ हुईं। पुलिस ने लोगों को जंतर-मंतर पर इकट्ठा होने से रोका और हज़ारों लोग हिरासत में लिए गए। इसके बाद 12 अक्टूबर को सामने आए आदेश में Delhi Police ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन के लिए तय जगहों की सूची से हटा दिया और रामलीला ग्राउंड, CBD ग्राउंड और बुराड़ी ग्राउंड को विकल्प बताया।
ध्यान रहे, ये Delhi Police का प्रशासनिक फ़ैसला है, कोर्ट का फ़ैसला नहीं। CJP ने इसकी निंदा की है और मामला दिल्ली हाई कोर्ट में भी पहुँचा है, इसलिए आगे की तस्वीर कोर्ट की सुनवाई के बाद ही साफ़ होगी।
आख़िर में
जंतर-मंतर सिर्फ़ एक सड़क नहीं, लोकतंत्र में आम आदमी की आवाज़ की निशानी रही है। प्रदर्शन कहाँ होंगे, ये तय करने का हक़ प्रशासन और अदालतों के पास हो सकता है, लेकिन सवाल पूछने का हक़ हर नागरिक का है। जागरूक बनिए, सवाल पूछिए और अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाइए।
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